अमरीका ने रोकी मदद,  पाक मीडिया ने भारत पर मढ़ दिए आरोप

इस्लामाबादःपाकिस्तान में इमरान खान के सत्ता संभालते ही उनके लिए मुसीबतें शुरू हो गई हैं। इमरान के पीएम बनने के बाद अमरीका ने पाक की मदद में फिर कटौती कर दी है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप  ने अपने ताजा फैसले के तहत पाकिस्तान को मिलने वाली 30 करोड़ डॉलर की रकम रोक दी है।पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में ट्रंप सरकार के इस कदम को एक तरफ भारत को खुश करने की कोशिश बताई जा रही है तो दूसरी तरफ अमरीका पर पाकिस्तान की तथाकथित कुरबानियों को नजरअंदाज करने के आरोप मढ़े जा रहे हैं।

‘जंग’ अखबार ने अमरीकी मदद में कटौती को सीधे-सीधे भारत से जोड़ा है। अखबार लिखता है कि मोदी सरकार को खुश करने के लिए ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान पर दबाव बनाए रखने की कोशिश में हर एक दो महीने बाद ताश का एक नया पत्ता फेंक रहा है। अखबार लिखता है कि पाकिस्तान ने बीते सात दशकों के दौरान अमरीका के सहयोगी की हैसियत से जो ‘सकारात्मक किरदार’ अदा किया है, अमरीका की मौजूदा सरकार उसे झुठलाने पर तुली हुई है।

अखबार कहता है कि अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो के पाकिस्तान दौरे से चार दिन पहले मदद रोकने का फैसला किया है। इससे साफ है कि यह पाकिस्तान पर मनमानी मांगें मनवाने के लिए दबाब डालने की कोशिश है लेकिन अब पाकिस्तान ने फैसला कर लिया है कि किसी की कोई गलत बात नहीं मानी जाएगी।रोजनामा ‘जिन्नाह’ लिखता है कि इस साल के शुरू में भी अमरीकी कांग्रेस ने पाकिस्तान को दी जाने वाली 50 करोड़ डॉलर की मदद रोक ली थी और इस तरह ताजा फैसले के बाद पाकिस्तान की 80 करोड़ डॉलर की मदद की रकम रोकी जा चुकी है।

अखबार लिखता है कि अमरीका दरअसल भारत की जुबान बोलता है और पाकिस्तान के खिलाफ किसी भी हद तक जाने को तैयार है। अखबार के मुताबिक अमरीका पाकिस्तान का ऐसा इम्तिहान न ले जो दोनों देशों के रिश्तों में खटास लाए। वहीं रोजनामा ‘एक्सप्रेस’ ने अपने संपादकीय में इमरान खान सरकार के सामने मौजूद आर्थिक चुनौती का जिक्र किया है।

अखबार कहता है कि देश को आर्थिक और वित्तीय संकट से निकाल तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ाना सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है। अखबार के मुताबिक हालात इतने गंभीर हैं कि सरकार के पास देश के आर्थिक तंत्र को चलाने के लिए पैसा नहीं है। वित्त मंत्री असर उमर ने सीनेट को बताया कि देश की व्यवस्था को चलाने के लिए तुरंत 9 अरब डॉलर की जरूरत है और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के सामने जाने या न जाने का फैसला संसद के सलाह मशविरे से होगा।

 

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