समाप्त करो हड़तालों तथा ‘बंद’ की नाटकबाजी

राजनेता बंद को पसंद करते हैं और विशेषकर तब जब आम चुनाव कुछ माह बाद होने वाले हों व बंद में मोदी राज की अनेकों विफलताओं को गिनाया जा सके तथा इस बंद में आम आदमी घर या काम पर भी नहीं जा सकता है। उसके बारे में कोई नहीं सोचता है और अन्य लोगों के लिए बंद एक अतिरिक्त छुट्टी बन जाती है, जिसमें वे अपनी पूरी ताकत का प्रयोग करते हैं। इसी क्रम में तेल के दामों में वृद्धि के विरुद्ध कांग्रेस ने भारत बंद बुलाया जिसके चलते अर्थव्यवस्था को लगभग 13 हजार करोड़ रुपए का नुक्सान हुआ है किंतु उन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। 

पिछले सप्ताह भी उच्च जातियों और पिछड़े  वर्ग के संगठनों ने अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम में संशोधनों के विरुद्ध भारत बंद का आह्वान किया। इसके दौरान राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र और दिल्ली में जनजीवन प्रभावित हुआ। दुकानें, व्यावसायिक प्रतिष्ठान, स्कूल और शैक्षिक संस्थान बंद रहे। इसके साथ ही मजदूर किसान संघर्ष रैली का आयोजन किया गया। देश की राजधानी दिल्ली में न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर यह रैली आयोजित की गई। गुजरात में हार्दिक पटेल 25 अगस्त से भूख हड़ताल पर हैं। वह पाटीदार समुदाय के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग कर रहे हैं। हाॢदक पटेल को अस्पताल में भर्ती कर दिया गया था। 

इन सबको देखकर लगता है भारत बंद अर्थात हड़तालों का देश है। इस छोटे से शब्द से लोग आतंकित होते हैं और इसको देखकर लगता है हमारे देश में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत चरितार्थ होती है। आज समाज का प्रत्येक वर्ग किसी न किसी बहाने बंद की योजना बना रहा है। बंद का कारण महत्वपूर्ण नहीं है अपितु अपना विरोध प्रदर्शन करना महत्वपूर्ण है और यह व्यापक हो तो अच्छा है। वस्तुत: कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता जब देश में कहीं न कहीं हड़ताल नहीं होती। चाहे कोई मोहल्ला हो, जिला हो या राज्य हो, कहानी एक जैसी है। स्थिति यह बन गई है कि लगता है हम बंद और हड़ताल के बीच जी रहे हैं। चाहे श्रमिकों की हड़ताल हो, राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन हो, रास्ता रोको हो या चक्का जाम, इन सब में हिंसा और अव्यवस्था फैलती है। लोग नियंत्रण के बाहर हो जाते हैं और इसको देखकर लगता है कि जिस किसी ने यह वाक्यांश गढ़ा कि तुम्हारी स्वतंत्रता वहां समाप्त होती है जहां मेरी नाक शुरू होती है, सही गढ़ा है। 

बंद के दौरान जन सम्पर्क की कवायद के अलावा बाहुबल का प्रदर्शन भी होता है जिसके चलते आम आदमी को आने-जाने, व्यवसाय आदि में नुक्सान होता है। दैनिक मजदूरी अर्जित करने वालों और निजी उद्यमों को बड़ा नुक्सान होता है और जो लोग हड़ताल करते हैं उन्हें भी इससे लाभ नहीं होता है। यूं कहें तो इस बंद के चलते देश या राज्य की जनता का कल्याण नहीं होता है। एक चौंकाने वाला आंकड़ा है कि 2017 में हड़ताल के कारण भारत में 11.73 लाख श्रम दिवस बेकार हुए, जिसके चलते 130 करोड़ रुपए का नुक्सान हुआ। 2016 की तुलना में 44 प्रतिशत अधिक श्रम दिवसों का नुक्सान हुआ है। गुजरात और तमिलनाडु में वस्त्र कामगार, कर्नाटक में आई.टी. कर्मचारी, केरल में कामगारों का विरोध प्रदर्शन, संसद के बाहर रक्षा कर्मियों का प्रदर्शन और विभिन्न राज्यों में सरकारी कर्मचारियों का प्रदर्शन आम बात रही। 

उल्लेखनीय है कि अगस्त 2003 में उच्चतम न्यायालय ने हड़ताल को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त की थी। केरल और कोलकाता उच्च न्यायालयों के निर्णयों को वैध ठहराते हुए उच्चतम न्यायालय ने बंद को सामूहिक सौदेबाजी का गैर-कानूनी और असंवैधानिक मार्ग बताया था। न्यायालय ने निर्णय दिया था कि सरकारी कर्मचारियों को, चाहे कोई भी उचित या अनुचित कारण हो, हड़ताल पर जाने का मूल, कानूनी, नैतिक या साम्यता का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने कहा था कि पीड़ित कर्मचारियों के पास अन्य विकल्प उपलब्ध हैं और हड़ताल का दुरुपयोग किया जाता रहा है जिसके चलते अव्यवस्था और कुशासन की स्थिति पैदा हुई है। न्यायालय ने यह निर्णय तमिलनाडु सरकार द्वारा 1.07 लाख कर्मचारियों की बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के बाद दिया था। 

प्रश्न उठता है कि यदि उच्चतम न्यायालय भी बंद और हड़तालों पर रोक नहीं लगा सका तो फिर भारत में हड़तालों और बंद की परम्परा की आलोचना करना बेकार है या इसके बारे में यह प्रश्न भी उठाना बेकार है कि इससे लोग कैसे लाभान्वित हुए हैं? क्या बंद करने वाले वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब समझते हैं या वे लोकतंत्र में मौलिक अधिकारों का दमन कर रहे हैं? नेताओं और श्रमिक संघों को हड़ताल करने के लिए कौन प्रेरित करता है? क्या वे अपने सदस्यों को एकजुट रखने के लिए ऐसा करते हैं या अप्रासंगिक बनने से बचने के लिए ऐसा करते हैं? या वे वास्तव में पार्टी के कार्यकत्र्ताओं या कामगारों के हितों के लिए ऐसा करते हैं या राजनीतिक कारणों से? 

विडम्बना देखिए। भारत के महानगरों में एक छोर से दूसरे छोर जाने पर आपको भारत के उदारीकरण के अंतर्निहित विरोधाभास दिख जाएंगे। एक ओर गगनचुम्बी इमारतें और विश्व की सबसे बड़ी कम्पनियों के चमचमाते नाम और मॉल देखने को मिलेंगे जो इस बात के प्रतीक हैं कि भारत का व्यावसायिक समुदाय और समाज महत्वाकांक्षी है और उस दिशा में आगे बढ़ रहा है। दूसरी ओर सड़कों पर गड्ढे मिलेंगे, बिजली की आपूॢत बाधित मिलेगी और शहरी अवसंरचना का अभाव मिलेगा जो बताता है कि सरकार इस मोर्चे पर पूर्णत: विफल है, जिसके चलते श्रमिक संघ बंद और हड़ताल करने के लिए उत्साहित होते हैं।समस्या का एक बड़ा कारण यह भी है कि अधिकतर श्रमिक संघों के अध्यक्ष नेता हैं जिनकी सरकार के प्रति अपनी नाराजगी होती है। बंद चाहे कितने भी नुक्सान पहुंचाएं उन पर रोक लगाना आसान नहीं है और ये एक तरह से छवि बनाने की प्रक्रिया भी बन गए हैं। यह विपक्ष के लिए एक हथियार बन गया है और वह इस हथियार का प्रयोग तब करता है जब वह निराश होता है या सत्ता की चाह रखता है। किंतु बंद की राजनीति अभी फीकी नहीं पड़ी है। यह अधिकतर लोगों के लिए असुविधा का साधन बन गया है। लोग अब इनके विरुद्ध अपना गुस्सा जाहिर करने लग गए हैं। 

एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार 78 प्रतिशत लोग बंद के विरुद्ध हैं। 80 प्रतिशत लोग नहीं चाहते कि राजनीतिक दल और धार्मिक संस्थाएं बंद का आयोजन करें। 95 प्रतिशत लोग नहीं चाहते कि नेतागण बंद का आयोजन करें और 75 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि बंद पर कानूनी रोक लगे। 80 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि बंद के दौरान हिंसा पर उनके नेताओं को कठोर दंड मिले। 62 प्रतिशत लोगों का मानना है कि बंद के दौरान किसी भी नुक्सान के लिए आयोजकों को दंडित किया जाना चाहिए। तथापि बंद के दौरान आम लोग छुट्टी मनाते हैं और उनके पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। समय आ गया है कि इस संबंध में हम अमरीकी कानून से प्रेरणा लें, जहां पर किसी भी व्यक्ति को राजमार्ग या उसके निकट भाषण देने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है ताकि राजमार्ग बाधित न हो। सभा करने का अधिकार इस तरह से सीमित कर दिया गया है कि उससे अन्य लोगों के अधिकारों में दखल न पड़े। नि:संदेह ऐसे वातावरण में, जहां पर हर कोई जोर-जबरदस्ती कर अपना हिस्सा लेना चाहता हो, किसको दोष दें। राजनेता और श्रमिक संघ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रश्न यह नहीं है कि हड़ताल और बंद का आयोजन किस लाभ के लिए कौन करता है? 

लोकतंत्र न तो भीड़तंत्र है और न ही अव्यवस्था करने का लाइसैंस। यह अधिकारों, कत्र्तव्यों, स्वतंत्रताओं और उत्तरदायित्वों के बीच संतुलन है। अपनी स्वतंत्रता में हमें जिम्मेदारियों और दूसरे की स्वतंत्रता का भी ध्यान रखना होगा। बंद के कारण सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। तथापि बंद सत्तारूढ़ वर्ग के विरुद्ध अपनी नाराजगी प्रदॢशत करने का एक साधन रहा है किंतु अब इसकी चमक फीकी पड़ गई है। इस वर्ष अनेक बंद और हड़तालें की गईं हैं। क्या ये बंद और हड़तालें अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल हुई हैं? यदि नहीं तो फिर सामान्य जनजीवन को क्यों अस्त-व्यस्त किया जाए? कुछ लोग कहेंगे कि सब चलता है और कुछ लोग कहेंगे कि ‘की फर्क पैंदा है’। और नेता लोग वोट प्राप्त करने के लिए ऐसा करते हैं। समय आ गया है कि आम जनता आगे आए और कहे ‘बंद करो यह नौटंकी।’-पूनम आई. कौशिश

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