आखिरकार बहाल हुआ समलैंगिकों का सम्मान

1950 में ब्रिटिश वैज्ञानिक एलन ट्यूरिंग ने ट्यूरिंग टैस्ट का विकास किया। यह कम्प्यूटर के योग्य व्यवहार को दिखाने की योग्यता का निर्धारण करता है। ट्यूरिंग टैस्ट में एक व्यक्ति एक इंसान और मशीन के बीच शाब्दिक संवाद (मैसेजिंग एप की तरह) का निरीक्षण करता है। यदि व्यक्ति पक्के तौर पर यह नहीं बता पाता है कि उनमें से कौन मशीन थी और कौन व्यक्ति, तो यह माना जाता है कि कम्प्यूटर ने टैस्ट पास कर लिया है। बेशक कम्प्यूटर की योग्यता के मामले में हम उस स्थिति में पहुंच गए हैं लेकिन ट्यूरिंग यह सब देखने के लिए जिंदा नहीं थे। 

1954 में 41 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था। उन्हें ब्रिटेन में समलैंगिकता का दोषी ठहराया गया था तथा उन्हें नपुंसक (ब्रिटेन में जेल के विकल्प के तौर पर यह सजा दी जाती थी) बनाने के लिए रासायनिक उपचार लेने के लिए बाध्य किया गया था। कुछ साल बाद उन्होंने आत्महत्या कर ली। ट्यूरिंग से एक शताब्दी पहले अंग्रेजी के महान कवि आस्कर वाइल्ड को भी समलैंगिक होने के अपराध का दोषी ठहराया गया था। कोर्ट में अपमानित होने के बाद उसने दो साल जेल में बिताए। उसको सजा देने वाले जज ने कहा : 

‘‘मेरे लिए तुम्हें सम्बोधित करना व्यर्थ है। जो लोग इस तरह की हरकतें करते हैं उन्हें शर्म से मर जाना चाहिए, और उनके ऊपर कोई असर पडऩे की उम्मीद नहीं रखी जानी चाहिए। मेरे सामने आए मामलों में यह सबसे बुरा मामला है। इन परिस्थितियों में मुझसे यह उम्मीद की जाती है कि मैं संविधान के दायरे में कठोरतम सजा सुनाऊं। मेरे फैसले में इस तरह के मामले के लिए यह बिल्कुल अपर्याप्त है। कोर्ट यह सजा सुनाता है कि तुम में से प्रत्येक को दो वर्ष तक कठोर श्रम सहित कारावास में रखा जाए।’’कोर्ट में भीड़ चिल्लाई ‘‘शेम!’’ वाइल्ड ने कहा ‘‘और मैं? माई लार्ड क्या मैं कुछ नहीं कह सकता?’’ परन्तु कोर्ट स्थगित हो गया और वाइल्ड को 2 वर्ष के कठोर श्रम के लिए भेज दिया गया। 

1967 में ब्रिटिश संसद ने द सैक्सुअल ऑफैंसिज एक्ट नामक कानून पास किया। इसके तहत दो बालिगों के बीच सहमति से यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया। यही काम इस सप्ताह हमारे सुप्रीम कोर्ट ने किया। इसके बाद ब्रिटिश समाचार पत्र ‘द गार्डियन’ में ग्लास्गो के एक पाठक पॉल ब्राऊंसे का एक पत्र आया, जिसमें लिखा था : भारतीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिक संबंधों के खिलाफ कानून को असंवैधानिक घोषित करने संबंधी लेख का आपका शीर्षक है ‘‘भारत के समलैंगिक विरोधी कानून के साथ औपनिवेशिक विषैली विरासत का अंत हुआ है।’’ भारत 71 साल से स्वतंत्र देश है। यदि यह कानून वास्तव में भारतीय संस्कृति के खिलाफ होता, तो यह उम्मीद की जानी चाहिए थी कि इसे बहुत पहले खत्म कर दिया गया होता।’’ 

ब्राऊंसे ने दुनिया भर के मीडिया में छपे विभिन्न लेखों का जिक्र किया था, जिनमें यह कहा गया था कि धारा 377 निश्चित ही औपनिवेशिक विरासत थी और इसलिए हम भारतीयों पर इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी। हालांकि, जैसा की उसने कहा, हमने स्वतंत्रता के 7 दशक बाद तक इसे अपने कानून की किताबों में रहने दिया। हमें शर्म के साथ यह स्वीकार करना चाहिए। एक अन्य बात जिस पर इस मामले में ध्यान नहीं दिया गया यह है कि इस धारा को हटाने का काम कानून की बजाय कोर्ट के द्वारा किया गया, जबकि यूनाइटिड किंगडम में इसे कानून द्वारा हटाया गया था। बहुत उचित होता यदि इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत हटाया जाता न कि फैसला सुनाने बैठे 5 व्यक्तियों द्वारा। 

मैं सिर्फ दो राजनेताओं के बारे में जानता हूं जिन्होंने संसद में इस बारे बात की थी अथवा समलैंगिक संबंधों को आपराधिक बताने वाले कानून के खिलाफ विधेयक लाने की कोशिश की थी। एक हैं बीजू जनता दल के तथागत सतपति और दूसरे कांग्रेस के शशि थरूर। मेरा ख्याल है कि शशि थरूर को कांग्रेस के अधिकतर सांसदों का समर्थन नहीं मिला था, जब उसने इस तरह का प्रयास किया था। मैं इस मुद्दे को क्यों उठा रहा हूं? 

भारतीय संविधान की प्रस्तावना कहती है: ‘‘हम भारत के लोग सत्य निष्ठा से...सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आॢथक और राजनीतिक न्याय; विचारों, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था तथा पूजा की स्वतंत्रता; स्थिति और अवसर की समानता; तथा उन सबके बीच भाईचारे को बढ़ावा देने, व्यक्ति का सम्मान सुनिश्चित करने तथा देश की एकता और अखंडता का संकल्प लेते हैं।’’ यह बिल्कुल स्पष्ट है कि इस डरावने कानून के साथ हम अपने साथी भारतीयों के सम्मान को ठेस पहुंचा रहे थे। हम उनकी अभिव्यक्ति, उनके विश्वास और उनकी सामाजिक स्थिति की समानता को नुक्सान पहुंचा रहे थे। 

हमने कितने ही ट्यूरिंग और वाइल्ड खो दिए हैं क्योंकि वे अभिव्यक्ति से डरते थे अथवा उन्हें यह डर था कि उन्हें समाज से बहिष्कृत कर दिया जाएगा तथा एक ऐसा जीवन जीने को मजबूर किया गया, जोकि निश्चित तौर पर झूठ पर आधारित था? आज बहुत-सी समलैंगिक महिलाएं शादीशुदा जीवन व्यतीत कर रही हैं जिसमें उनकी कोई रुचि नहीं थी परन्तु सामाजिक दबाव तथा शर्म के कारण उन्हें ऐसा करना पड़ा। उनकी संख्या का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। हमें इस बात के लिए धन्यवादी होना चाहिए कि आखिरकार हमने उस कानून से छुटकारा पा लिया है जोकि स्वतंत्र भारत में नहीं होना चाहिए, हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि यह कानून 71 वर्ष तक क्यों रहा तथा इसे कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित करने की जरूरत क्यों पड़ी। यह मामला राजनीति का विषय होना चाहिए था क्योंकि इसके द्वारा हमने उस वायदे के खिलाफ काम किया, जो हमने खुद के साथ संविधान की प्रस्तावना में किया था। जनता के अधिकार जनता द्वारा ही सुनिश्चित किए जाते हैं और यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।-आकार पटेल

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