Opinion: पर्यावरण हो या राजनीतिक फिजा, आपातकाल जैसे हाल, कोई तो सुने गुहार

नई दिल्ली: जून का दूसरा हफ्ता फिर अब तीसरा हफ्ता। राजधानी दिल्ली धूल, धरना, जवाबी धरना, अनशन, जवाबी  अनशन, प्रदर्शन और फिर जवाबी प्रदर्शन के साथ तरह-तरह के तोहमतों से जूझ रही। राष्ट्रीय राजधानी में सांसों पर संकट छाया, लोगों का दम घुटने लगा और बाहर निकलने से भी लोग डरने लगे। इसी बीच दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार एलजी हाउस में जाकर धरने पर बैठ गई। मांग यह कि आईएएस अधिकारी हड़ताल पर हैं और उसे खत्म कराया जाए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि अधिकारी काम नहीं कर रहे। दूसरी तरफ सरकार भी धरने पर, मतलब दिल्ली का शासन-प्रशासन ठप। अब दिल्ली चले तो कैसे?


इसी बीच राजस्थान से धूलभरी आंधी का प्रकोप भी छाया और देखते-देखते पूरी राजधानी में सांस लेना मुश्किल हो गया। लोग बीमार होकर अस्पताल पहुंचने लगे। एक नहीं दो नहीं, तीन दिनों तक यह सब चलता रहा। तब कहीं जाकर जमीन पर बचाव के लिए कुछ हरकत दिखाई दी। जब तक एहतियाती कदम उठाए गए, तब तक धूल की चादर खुद ही कम होने लगी थी। हवाओं ने रुख बदला तो जानलेवा प्रदूषण का स्तर नीचे गिरने लगा था। कहने का मतलब यह है कि जिस दिन आसमान में धूल की चादर छायी दिखाई दी, उसी दिन अगर तत्काल बचाव वाले कदम उठा लिए गए होते तो लोग कम बीमार होते और सांस की तकलीफ उतनी नहीं होती, जितनी लोगों ने झेली। खता किसकी है, कौन जिम्मेदार है, कौन बनेगा तारणहार, इन सब सवालों के साथ देश की राजधानी दिल्ली दुहाई दे रही है। प्रदूषण, जल, बिजली आदि संकट और आपातकाल जैसी स्थिति में तत्काल बचाव के कदम उठाए जाने चाहिए, यह गुहार लगा रही राजधानी।

कैपिटल का गला भी सूखा पेयजल के लिए बहा खून
जून का महीना वैसे तो भीषण गर्मी वाला ही होता है और पेयजल संकट भी होता ही है। लेकिन, धरना और धूल के प्रदूषण के बीच जब पेयजल किल्लत हुई तो तकलीफ ज्यादा खली। यही नहीं संगम विहार में पेयजल की लड़ाई में तो खून तक बहाया गया। पानी के लिए हत्या जैसी घटना को अंजाम दे दिया गया। धूल, धरना, वध यह सब कहीं न कहीं राजकाज से जुड़ा है। राज धरने पर और काज में कथित हड़ताल। दिल्ली दुहाई न दे तो आखिर क्या करे?

सियासी पारा चढ़ा तो प्रदूषण ने भी बनाया रिकॉर्ड
दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार उपराज्यपाल भवन के भीतर धरने पर बैठी तो इससे सियासी पारा चढ़ गया। चार-चार मुख्यमंत्री साथ में आए तो देशभर में अनशन की तपिश फैल गई। लेकिन, इसी बीच 13 से 16 जून के बीच प्रदूषण ने भी रिकॉर्ड बनाया। पीएम 10 और पीएम 2.5 का स्तर जितनी तेजी से जाड़ों में नहीं बढ़ता, उससे कहीं ज्यादा रफ्तार से जून में ऊपर गया। मतलब खतरनाक फिर अत्यंत खतरनाक का स्तर भी पार कर गया। जो लोग कमरों के भीतर रहे, उनको तो धूल के प्रदूषण ने उतना नहीं सताया, लेकिन जो लोग बाहर निकले उनका बुरा हाल हो गया। खांसी के साथ सांस लेने में तकलीफ का सामना लोगों ने किया। पहले से सांस की बीमारी झेल रहे लोग तो दम घुटने जैसी स्थिति से परेशान रहे।

हवा के स्तर पर एक नजर
सर्दी और गर्मी के मौसम में होने वाले प्रदूषण में फर्क है। गर्मी में होने वाला प्रदूषण कई मायनों में ज्यादा घातक है। सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरनमेंट के अनुसार गर्मी में वाहनों से उत्सर्जित होने वाला धुआं जब वातावरण में आता है तो उसमें धूल के कण चिपक जाते हैं। इससे हवा खराब होती है और सांस में तकलीफ होती है। नमी की कमी और तपन के कारण स्थिति और भी गंभीर बन जाती है। समझना जरूरी है कि धूल के कण अन्य खतरनाक कणों के लिए वाहक का काम करते हैं और स्थिति को जानलेवा बनाते हैं। मौसम विभाग के अनुसार मानसून से पहले होने वाली बरसात नहीं होने के कारण भी हालात बिगड़ रहे हैं।

इथेनॉल के प्रयोग पर होना चाहिए काम
पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों का धुआं प्रदूषण बढ़ाता है। जबकि इथेनॉल का प्रयोग अगर ईंधन के रूप में किया जाए तो इससे प्रदूषण पर लगाम लगेगी। सरकार को चाहिए कि इस दिशा में जितनी तेजी से हो, उतनी तेजी से काम किया जाए। इससे जहां प्रदूषण से राहत मिलेगी वहीं इथेनॉल के सस्ता होने से आमजन को आर्थिक राहत भी मिलेगी। हाईड्रोजन पर बेस होने के कारण कोयला, प्राकृतिक गैस, बायोमास, ठोस कचरे, कार्बन डाईऑक्साइड से इसे बनाया जा सकता है। इथेनॉल के प्रयोग से जनजीवन में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। यह डीजल की जगह ले सकता है और पेट्रोल में मिलाकर भी उपलब्ध कराया जा सकता है।

दोष दिल्ली का नहीं, पर निदान की जिम्मेदारी तो है
राजधानी में इस समय जो प्रदूषण छाया, वह भले ही दिल्ली के दोष के कारण नहीं हो। उसके लिए पूरी तौर पर राजस्थान से आने वाली धूलभरी हवाएं ही जिम्मेदार हैं, लेकिन जानलेवा प्रदूषण से बचाव और निदान की जिम्मेदारी तो हमारी ही है। यानी इसके लिए तो दिल्ली को ही काम करना होगा। दिल्ली में प्रदूषण को लेकर हर 15 दिनों में समीक्षा और योजना संबंधी बैठक हुआ करती थी। लेकिन, बताया जा रहा है कि यह मीटिंग तीन महीने से नहीं हुई है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तो ट्वीट करके यहां तक लिख दिया कि दिल्ली के पर्यावरण सचिव ने पिछले 115 दिनों से पर्यावरण मंत्री से मुलाकात तक नहीं की और न ही किसी माध्यम से संवाद स्थापित किया। केजरीवाल के इस ट्वीट से साफ है कि प्रदूषण से बचाव को लेकर राजधानी में कोई भी  काम काफी दिनों से नहीं हो रहा है। यह बताना जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर दिल्ली और पड़ोसी प्रदेशों को मिलाकर एक कमेटी बनाई गई थी। इसी कमेटी की बैठक नियमित रूप से होनी चाहिए। यह कमेटी ही प्रदूषण बढऩे पर सरकारों को जरूरी कदम उठाने के लिए कहती है।

मंत्रालय ने जताई त्वरित कार्रवाई की दरकार 
पर्यावरण मंत्रालय ने राजधानी का बुरा हाल देखकर च्ग्रेडेड रेस्पॉन्स एक्शन प्लानज् की दरकार जताई है। बता दें कि जाड़ों में दिल्ली में प्रदूषण का स्तर जब भी खतरे के निशान से ऊपर जाता है तब इस एक्शन प्लान पर अमल किया जाता है। सामान्यत: सर्दी के मौसम में इस तरह की स्थिति आती है। जब ऑड, इवन से लेकर पानी का छिड़काव आदि का काम किया जाता है। उस समय निर्माण पर भी रोक लगाई जाती है। लेकिन, बीते दिनों की हालत से यह लग रहा है कि अब गर्मी के दिनों में भी विशेष इंतजाम करने होंगे, ताकि प्रदूषण से बचा जा सके। राजस्थान की धूल से राजधानी का एयर क्वालिटी इंडेक्स 500 के करीब पहुंच गया जो अत्यंत खराब माना जाता है। यह इंडेक्स 50 से कम ही रहना चाहिए। जो स्थिति बनी वह सांस के रोगियों के लिए बहुत खतरनाक होती है, आम लोगों को भी काफी तकलीफ देती है।

अदालत ने जारी किया नोटिस
प्रदूषण को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड और दिल्ली सरकार को नोटिस भी जारी किया। अदालत ने कहा कि आखिर प्रदूषण की इतनी खतरनाक स्थिति है, फिर भी बचाव के लिए कदम क्यों नहीं उठाए गए। एक याचिका दाखिल करके अदालत से इस मामले में निर्देश जारी करने की याचना की गई थी। याचिका में कहा गया था कि पर्यावरण के जो चीजें फायदेमंद होती हैं, उनको बड़े स्तर पर करना चाहिए।

पेयजल किल्लत पर भी देना होगा ध्यान
राजधानी केवल प्रदूषण की स्थिति में ही त्वरित कार्रवाई की गुहार नहीं करती, बल्कि पेयजल संकट के लिए भी तत्काल उपाय करने की दुहाई देती है। जनसंख्या के हिसाब से कुल 1100 एमजीडी पानी की जरूरत दिल्ली को है, लेकिन जलबोर्ड 890 एमजीडी के करीब ही पेयजल उपलब्ध करा पाता है। ऐसे में पेयजल को लेकर लड़ाई-झगड़ा और हाहाकार मचना तय है। इसी बीच जब हरियाणा से पानी कम आता है या यमुना में अमोनिया की मात्रा बढ़ जाती है तो स्थिति विकट हो जाती है। लोगों को कई-कई दिनों तक पेयजल उपलब्ध नहीं होता। ऐसी स्थिति से कैसे निपटा जाए और लोगों को तकलीफ कम से कम हो, इस दिशा में ठोस योजना बनाकर काम करने की दुहाई दिल्ली देती है।

राजस्थान से रहना होगा सावधान
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक राजस्थान के मौसम में नमी नहीं है। इस कारण तापमान भी बहुत ज्यादा है। वहां पर धूलभरी आंधी चल रही है और जब हवा का रुख राजधानी की तरफ होता है तो धूल के गुबार इधर आते हैं और आसमान पर छा जाते हैं। अगर यहां पर हवा की गति कम होती है तो फिर हालात बहुत खतरनाक हो जाते हैं। प्रदूषण जानलेवा स्थिति तक पहुंच जाता है। अस्पतालों में सांस के रोगियों की संख्या बढऩे लगती है। यह स्थिति हर साल की है, लेकिन इस साल बीते पांच-छह दिनों में हालात बदतर रहे। ऐसे में राजधानी को सावधान होना जरूरी है और राजस्थान की धूलभरी आंधी के प्रभाव से कैसे बचा जाए, इसके लिए काम करना जरूरी है।

पूरे एनसीआर पर नजर दौड़ाने की जरूरत
ऐसा नहीं है कि केवल राजधानी में ही विशेष ध्यान देने की जरूरत है, प्रदूषण से बचाने के लिए पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र पर नजर दौड़ानी होगी। हालात हर तरफ खराब रहे हैं। नोएडा, ग्रेटर नोएडा जहां पर निर्माण का काम बड़े स्तर पर हो रहा है, वहां धूल की चादर ने प्रदूषण को एक तरह से चरम पर पहुंचा दिया था। गुडग़ांव और गाजियाबाद की स्थिति भी बहुत खराब थी। 

Related Stories:

RELATED मुख्‍य सचिव मारपीट मामला: CM केजरीवाल सहित 13 लोगों को कोर्ट का समन