पढ़ें, मौत को 'दुल्हन' बनाने वाले भगत सिंह के जीवन से जुड़े कुछ अनसुने किस्से

जालंधरः भारत की आजादी के लिए 23 मार्च 1931 को  फांसी के फंदे को गले लगाने वाले महान शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। जब-जब आजादी की बात होगी तब-तब इंकलाब का नारा देने वाले भारत माता के इन वीर सपूतों को याद किया जाएगा। 


भगत सिंह के पूर्वजों का जन्म पंजाब के नवांशहर के समीप खटकड़कलां गांव में हुआ था। इसलिए खटकड़कलां इनका पैतृक गांव है। भगत सिंह के दादा सरदार अर्जुन सिंह पहले सिख थे जो आर्य समाजी बने। इनके तीनों सुपुत्र किशन सिंह, अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे। 13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्‍याकांड ने भगत सिंह पर गहरा असर डाला और वे भारत की आजादी के सपने देखने लगे। जानकर हैरानी होगी कि परिजनों ने जब भगत सिंह की शादी करनी चाही तो वह घर छोड़कर कानपुर भाग गए। 

अपने पीछे वे जो खत छोड़ गए, उसमें उन्‍होंने लिखा कि उन्‍होंने अपना जीवन देश को आजाद कराने के महान काम के लिए समर्पित कर दिया है। इसलिए कोई दुनियावी इच्‍छा या ऐशो-आराम उनको अब आकर्षित नहीं कर सकता। ऐसे में, शहीद-ए-आजम की शादी हुई, पर कैसे हुई, इसके बारे में बताते हुए भगत सिंह की शहादत के बाद उनके घनिष्ठ मित्र भगवती चरण वोहरा की धर्मपत्नी दुर्गा भाभी ने, जो स्वयं एक क्रांतिकारी वीरांगना थीं, कहा था,"फांसी का तख्ता उसका मंडप बना, फांसी का फंदा उसकी वरमाला और मौत उसकी दुल्हन।"

एक समाचार पत्र के संवाददाता ने जब सरदार भगत सिंह के भांजे सरदार जगमोहन सिंह से बातचीत की तो उन्होंने भगत सिंह के जीवन से जुड़ी कई अनसुनी कहानियां बताईं। उन्होंने बताया, "8 साल की उम्र में एक बार सरदार भगत सिंह अपनी छोटी बहन के साथ बैठ कर पढ़ाई कर रहे थे। उस दौरान भगत सिंह कोई किताब पढ़ रहे थे। उसी समय उत्सुकता से छोटी बहन ने उनकी किताब देखने की कोशिश की। तब भगत सिंह ने अपनी 4 साल की बहन के सीने पर जलती लालटेन रख दी, जिससे वह कई जगह झुलस गई। जैसे ही वह चिल्लाई, भगत सिंह ने बहन का मुंह बंद करते हुए कहा कि चिल्लाना नहीं, मैं तो देखना चाहता था कि तुममें कितनी सहन शक्ति है। जब सहन शक्ति होगी, तभी देशभक्ति की राह में आगे चल पाओगी। भगत सिंह से यह बात सुनकर छोटी बहन ने अपनी पीड़ा को सहते हुए चिल्लाना बंद कर दिया।

मां से रही जीवन भर एक शिकायत
सरदार जगमोहन सिंह ने बताया, "भगत मामा बचपन से ही कसरत के बेहद शौकीन थे। वे लाहौर में हुई लट्ठबाजी प्रतियोगिता के चैम्पियन भी रहे। एक बार वो अपनी मां (मेरी नानी) के साथ तांगे से कहीं जा रहे थे। कुछ दूर चलने के बाद तांगा एक गड्ढे में पलट गया, जिससे मामा के सीने की दो पसलियां दब गईं। उसी की वजह से वे नानी से कहते रहते थे- मैं इतनी कसरत करता हूं, लेकिन मेरा सीना पूरा नहीं फूलता। आपकी वजह से मेरी दो पसलियां दब गईं। आप मुझे लेकर नहीं गई होतीं तो शायद मेरी पसलियां न दबतीं और मेरा सीना पूरा फूलता।"

लोगों को बचाते-बचाते गल गया था पैर
जगमोहन सिंह बताते हैं, "भगत सिंह तैराकी और नौका चलाने के बेहद शौकीन थे। वे कितने भी गहरे पानी में बांस के सहारे चल सकते थे। 1926 में कानपुर में भीषण बाढ़ आई। तब उन्होंने ने बीके दत्त के साथ मिलकर बाढ़ पीड़ितों को बचाने के लिए काफी दिनों तक कम किया था। मेरी मां बताती थीं कि लौटते वक्त उनके पैर का निचला भाग लगातार पानी में रहने के कारण गल गया था।"

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