नजरिया: 48 की उम्र में राहुल गांधी को 84 का फेर

नेशनल डेस्क (संजीव शर्मा): कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आज 48 साल के हो गए हैं। इस अवसर पर कांग्रेसी कुनबे से इतर भी उनके लिए बधाइयों का सिलसिला  बना हुआ है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अल सुबह ट्वीट के जरिये उन्हें बेहतर भविष्य और स्वस्थ जीवन की शुभकामनायें दीं। कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी का यह पहला जन्मदिन है। करीब 19 साल तक अध्यक्ष रहने के बाद पिछले साल ही सोनिया  गांधी ने उन्हें पार्टी की कमान सौंपी थी। उस लिहाज से राहुल के इस जन्मदिन के बहाने उनके भविष्य की चुनौतियों की चर्चा लाजमी है। हालांकि अध्यक्ष बनने के बाद राहुल की किस्मत कह लीजिए या राजनीतिक कौशल, वे बीजेपी के विजय रथ को रोकने में कामयाब हुए हैं। कर्नाटक का चुनाव उनके कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद पहला चुनाव था (हालांकि गुजरात के नतीजों के समय वे अध्यक्ष बन चुके थे ) ऐसे में पहले ही चुनाव में उन्होंने जोड़-तोड़ से ही सही बीजेपी को विपक्ष में बैठने पर मजबूर कर दिया। यह शुरुआत थी। 
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वास्तव में अब उनके सामने अनेक लक्ष्य हैं। यानी भारतीय दर्शन में जिसे 84 का फेर कहते हैं, राहुल को उसी से पार पाना है। इनमे से दो प्रमुख चुनौतियां हैं तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव और फिर लोकसभा चुनाव से पहले महागठबंधन को मूर्त रूप देना। यह वास्तव में अग्नि परीक्षा सरीखा है जिसके लिए राहुल को जन्मदिन पर ही ग्रह शांति करवानी होगी। हालांकि राहुल अगर जरा सी भी सियासी सूझ-बूझ से काम लेंगे तो लक्ष्य भेदना उनके लिए कठिन न होगा। मध्य प्रदेश में शिवराज सरकार 15  साल की सत्ता के बाद उपजने वाली स्वाभाविक एंटी इनकम्बेंसी से रू-ब -रू है। छत्तीसगढ़ में भी यही हाल है और राजस्थान में बदलाव का इतिहास  राहुल गांधी के  लिए सुखद एहसास वाला है। ऐसे में राहुल गांधी को कुछ साथियों के संग मिलकर यह किले फतह करने होंगे। अगर सब सही रहा तो आगे का रास्ता आसान हो जायेगा। बीजेपी अगर इन राज्यों में हारती है तो उसका मनोबल गिरेगा। 
PunjabKesariउधर कांग्रेस  को महागठबंधन में  शक्ति हासिल हो जाएगी और वो क्षेत्रीय दलों के मोलभाव को नियंत्रित करने की स्थिति में होगी। राहुल गांधी ने हाल ही में खासकर गुजरात चुनाव के दौरान एक नयी सियासत का सूत्रपात किया था। उन्होंने बीजेपी की ब्रांड टेम्पल पॉलिटिक्स  में सेंध लगाई थी। मंदिर-मंदिर जब राहुल घूमे तो बीजेपी के निशाने पर आ गए थे। वही कर्म और क्रम कर्नाटक में भी यथावत रहा और उसके सकारात्मक परिणाम भी मिले। हाल ही में अटल बिहारी वाजपेयी के बीमार होने पर जिस तरह राहुल गांधी ने सबसे पहले अस्पताल पहुंच कर बीजेपी  के पसीने छुड़वाए वह भी एक मास्टर स्ट्रोक था। आखिर बीजेपी यही तो करती रही है। गांधी, पटेल शास्त्री को जिस चतुराई से मोदी ने भुनाया  उसी चतुराई से जब राहुल ने वाजपेयी वाला दांव चलाया तो बीजेपी के भीतर की टीस पूरे देश ने देखी। इसे जारी रखना होगा। बीजेपी का एक और  मास्टर स्ट्रोक है। 
PunjabKesariचुनाव से ऐन पहले अमित शाह विपक्षी पार्टियों में तोड़-फोड़ करते हैं। राहुल गांधी को यह अस्त्र भी आजमाना होगा।  आखिर लोहे को लोहा काटता है। युद्ध के नियम भी यही हैं। भाले के मुकाबले भाला, तलवार के मुकाबिल तलवार और धनुष का जवाब धनुष से। राहुल यह अब सीख चुके हैं। जरूरत सिर्फ  इन दावं को कुशलता से चलने की है। अगर उन्होंने यह कर लिया तो निश्चित ही वे 84 चुनौतियों के फेर से निकल कर वहाँ पहुँच सकते हैं जिसकी कामना उन्होंने कर्नाटक में की थी।   
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