नजरिया: राहुल गांधी की कैलाश यात्रा से मोदी भक्तों में घबराहट क्यों?

नेशनल डेस्क (संजीव शर्मा ):  कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की कैलाश मानसरोवर यात्रा आजकल टॉप ट्रेंडिंग है। कम से कम बीजेपी के गलियारों में। बीजेपी पता नहीं क्यों राहुल गांधी की कैलाश यात्रा से घबराई हुई है। इस कदर घबराहट है कि पहले पार्टी के एक तथाकथित फायरब्रांड प्रवक्ता ने उन्हें चीनी कहा। यहीं बात खत्म नहीं हुई यात्रा के दौरान उनके भोजन तक को लेकर विवाद पैदा किया गया। भक्तों के टोले ने अफवाह उड़ाई की राहुल ने मांसाहार किया। बाद में जब खुद इस मसले पर होटल ने साफ किया कि ऐसा कुछ नहीं था तो भक्तों की खासी किरकिरी हुई। होटल वालों ने तो बिल की कॉपी ही सोशल मीडिया पर डाल दी थी, लेकिन भक्त कहां मानने वाले थे। 



मानो उनकी तो अस्मिता पर डाका डाल दिया हो राहुल गांधी ने कैलाश जाने का फैसला करके लिहाजा राहुल से यात्रा का सबूत मांगा जाने लगा। यहां तक कहा गया कि राहुल रास्ते में मौज मस्ती करके लौट लिए  और कैलाश यात्रा पर गए ही नहीं। लीजिए सबूत भी आ गए हैं। एक नहीं एक एक करके कई वीडियो राहुल गांधी की इस कैलाश यात्रा के सामने आये हैं। एक तो किसी अन्य पर्यटक ने अपलोड किया है जिसने रास्ते में राहुल गांधी को पहचान कर उनसे मुलाकात की। राहुल के अपने खींचे वीडियो भी उनके और कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से अपलोड हुए हैं। अब सवाल यह कि राहुल गांधी की कैलाश यात्रा को लेकर बीजेपी की सांसें क्यों अटकी पड़ी है? जिस दिन राहुल कैलाश यात्रा के लिए रवाना हुए थे उसी दौरान बिम्सटेक की बैठक के बहाने नरेंद्र मोदी नेपाल में थे।  उन्होंने भी तो पशुपति नाथ जाकर दर्शन किए। लेकिन कांग्रेस की तरफ से उसपर तो कोई इफ्स  एंड बट्स नहीं लगाए गए। अपनी अपनी आस्था है। तो फिर क्यों बीजेपी परेशान है। 



एक तरफ तो शराब पीकर हुड़दंग मचाने वाले कांवडिय़ों पर योगी राज में फूल बरसाए जा रहे हैं और दूसरी तरफ राहुल गांधी की यात्रा को लेकर बिना मतलब का हंगामा खड़ा किया जा रहा है। शराब पीकर, भांग खाकर अगर कांवड़/ गंगाजल ले जाना सही है तो फिर क्यों यह सूंघा जा रहा है कि किसने क्या खाया था। दरअसल वजह कुछ और है। बीजेपी का तथाकथित हिंदुत्व अब खतरे में है। राम मंदिर को  लेकर कोर्ट की बात मानने की दलील और एससी -एसटी एक्ट को लेकर कोर्ट के फैसले को संसद में पलटने के बाद बीजेपी खुद के रचे चक्रव्यूह में घिर गयी है। उसकी स्थिति अब ऐसी होने लगी है की दुविधा में दोनों गए वोट मिले न राम। जबकि दूसरी तरफ राहुल गांधी ने तेजी से सियासी पैंतरा बदला है। उन्होंने खिसकते मुस्लिम जनाधार की भरपाई के लिए हिन्दू वोटों में सेंध लगाने की रणनीति अपनाई है। इसकी शुरुआत उन्होंने गुजरात चुनाव से की थी. यानी विधिवत कांग्रेस अध्यक्ष बनने से ठीक पहले गुजरात चुनाव में उन्होंने सारे मंदिर नाप दिए। असर साफ दिखा और बीजेपी को जैसे तैसे जीत  हासिल हुई। उसके बाद इसी टेम्पल पॉलिटिक्स ने कर्नाटक में असर दिखाया और वहां बीजेपी सत्ता में आने के तीन दिन बाद ही बेदखल हो गई।
 


इसी बीच किरैना के उपचुनाव ने यू पी के महंतों को भी आईना दिखा दिया। ऐसे में हिन्दू-मुस्लिम की राजनीती करने वाली बीजेपी के गढ़ में सेंधमारी हो गई है। यही वजह है कि उसे अब अपना बड़ा वोट बैंक खिसकने का डर सत्ता रहा है। उसे लगता है कि राहुल गांधी उसके उस हिन्दू वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा रहे हैं जिसे बीजेपी बरसों से अपनी बपौती मानती रही है। दिलचस्प ढंग से पेट्रोल डीजल  की कीमतों, नोटबंदी  की असफलता जिसमे तय से ज्यादा नोट वापस बैंकों में आने वाले हैं ( 99. 3) फीसदी आ चुके हैं और नेपाल, भूटान से आने हैं ) और 370  से पहले 377, रुपए की सेहत जैसे मसले इस आग में आगे चलकर घी डाल सकते हैं। इसलिए राहुल से बीजेपी घबराई हुई है।  वैसे मुझे भी तीसरी कक्षा में पढ़ी वो कहानी याद आ रही है जिसमे बोपदेव नाम का छात्र बार बार फेल होता है। बाद में वो मरने के लिए कुएं पर जाता है। वहां पत्थर पर रस्सी के निशान देखकर उसके मन में फिर से संघर्ष का उत्साह जागता है और अगले साल की परीक्षा में वो फस्र्ट आ जाता है। कहीं बीजेपी को भी बोपदेव फोबिया तो नहीं हो गया।

  

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