राफेल पर कांग्रेस 'फ़ेल'! (Video)

नई दिल्लीः (मनीष शर्मा) राफेल डील मामले में मोदी सरकार को बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राफेल सौदे में कोई संदेह नहीं, विमान हमारी जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं। आपको बता दें भारत ने करीब 58,000 करोड़ रूपए की कीमत से 36 राफेल विमान खरीदने के लिए फ्रांस के साथ समझौता किया है और कांग्रेस पार्टी लगातार दावा करती आ रही है कि इस डील में सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी को फायदा पहुंचाया है। प्रधानन्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की पीठ ने इस मामले में दायर याचिकाओं पर 14 नवंबर को सुनवाई पूरी की थी। आइये जानते हैं सुप्रीम कोर्ट ने राफेल डील पर क्या फैसला सुनाया।



राफेल डील पर सुप्रीम फैसला:

  • विमान सौदे की प्रक्रिया पूरी तरह सही है।
  • राफेल विमानों की क़्वालिटी पर कोई शक नहीं है।
  • राफेल डील पर न SIT और न CBI ही के जांच की ज़रुरत है।
  • राफेल की कीमत देखना कोर्ट का नाम नहीं।
  • कोर्ट सरकार को 126 विमान खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।
  • कुछ लोगों की धारणा के आधार पर कोर्ट फैसला नहीं सुना सकती।
  • किसी को कमर्शियल फायदा पहुँचाने वाली बात सच साबित नहीं हुई।
  • देश लड़ाकू विमानों के बिना नहीं रह सकता है।
  • दसॉ एविएशन द्वारा भारतीय ऑफसेट पार्टनर (रिलायंस ) के चयन में कुछ गलत नहीं मिला।


क्या है राफेल डील?
2007 में 126 लड़ाकू विमानों की ज़रुरत महसूस की गई। लेकिन 25 जनवरी 2016 तक आते-आते 36 राफेल विमानों का ही सौदा हो पाया। ये छत्तीस विमान तत्काल उड़ने की हालत में मिलेंगे। इन 36 विमानों को दो स्क्वाड्रन में बांटा जाएगा। इनमें से एक पाकिस्तान से मुकाबले के लिए अंबाला में जबकि दूसरा चीन से मुकाबले के लिए पश्चिम बंगाल के हाशिमपुरा में तैनात किया जाएगा।



सितम्बर 2019 में भारत को विमानों की पहली खेप मिलने जा रही है। लेकिन पहली खेप मिलने से पहले ही यह यह डील विवादों में घिर गई। कांग्रेस पार्टी पिछले एक साल से इसमें घोटाला होने का आरोप लगा रही है।

कांग्रेस का पहला आरोप
बीजेपी सरकार ने सौदे में गड़बड़ी कर HAL से ठेका लेकर अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस को दे दिया।

भारत सरकार, फ्रांस सरकार और दैसॉ कंपनी का जवाब

  • 22 सितम्बर 2018 को मिनिस्ट्री ऑफ़ डिफेन्स ने प्रेस रिलीज़ जारी कर कहा कि दैसॉ का ऑफसेट पार्टनर चुनने में भारत का कोई रोल नहीं था।
  • 21 सितम्बर 2018 को फ्रांस के विदेश मत्रालय के प्रवक्ता का ब्यान आया था कि भारतीय अधिग्रहण प्रक्रिया के मुताबिक, फ़्रांस की कंपनियों के पास ये पूरी आज़ादी है कि वो उन भारतीय साझेदार कंपनियों को चुनें जिन्हें वो सबसे ज़्यादा उपयुक्त समझती हैं।
  • 21 सितम्बर 2018 दसॉ प्रेस रिलीज़ जारी कर कह चुकी है कि रिलायंस के साथ जुड़ना कंपनी का फैसला था।उस पर भारत सरकार का कोई दबाव नहीं था।


कांग्रेस का दूसरा आरोप
बीजेपी सरकार हर विमान को करीब 1670 करोड़ रुपये में खरीद रही है, जबकि यूपीए सरकार जब 126 राफेल विमानों की खरीद के लिए बातचीत कर रही थी। तो उसने इसे 526 करोड़ रुपये में फ़ाइनल किया था।



भारत सरकार का जवाब
12 मार्च 2018 को रक्षा मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया कि राफेल के हर विमान की कीमत 670 करोड़ रूपये है। भारत सरकार जल्द से जल्द तैयारस्थिति में 36 राफेल विमान खरीदना चाहती है। लेकिन इसमें भारत के लिए जो उपकरण और बदलाव किये जा रहे हैं वो कीमत शामिल नहीं है।

कांग्रेस का तीसरा आरोप
12 मार्च 2018 को रक्षा मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया कि रक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) ने 58,000 करोड़ रुपये के राफेल सौदे को 24 अगस्त 2016 में मंजूरी दे दी थी।



भारत ने आखिरी बार 1996 में सुखोई-30 MKI के तौर पर कोई लड़ाकू विमान खरीदा था। कारगिल युद्ध के बाद 2001 में रक्षा मंत्रालय ने फाइटर एयरक्राफ्ट की कमी का ज़िक्र किया था। आरोप प्रत्यारोप के चलते 36 राफेल विमानों की खरीद में देरी ना हो जाये और कहीं देश की रक्षा तैयारियों को हानि न उठानी पड़े। इसी चिंता का ज़िक्र रक्षा मामलों की स्थायी समिति की 2017-18 की रिपोर्ट में भी है।

क्या कहती है रिपोर्ट?

  • भारतीय वायु सेना इस समय अपनी स्वीकृत ताकत से 9 स्क्वाड्रन कम है मतलब 162 विमान कम हैं। उसके पास इस वक्त सिर्फ 33 विमान स्क्वाड्रन हैं जबकि उसकी स्वीकृत ताकत 42 स्क्वाड्रन की है। एक स्क्वाड्रन में 18 लड़ाकू जेट विमान होते हैं। चीन तथा पाकिस्तान के साथ एक ही समय पर युद्ध के लिए 45 स्क्वाड्रन की स्वीकृति दी गई है।
  • 2027 तक मिग-21, मिग-27 और मिग-29 के 10 स्क्वाड्रन बेड़े से हटा लिए जायेंगे, जिससे स्क्वाड्रन की संख्या गिर कर 19 हो जाएगी।
  • 2032 में यह स्थिति और भी खराब हो जाएगी उस समय यह संख्या 16 ही रह जाएगी। समिति सालों से स्क्वाड्रन शक्ति में कमी का मुद्दा बार-बार उठा रही है लेकिन हर सरकार का रवैया उदासीन ही रहा है। समिति रक्षा मंत्रालय के जवाब से भी असंतुष्ट है। बीजेपी को जिन मुद्दों से खतरा है वो है। नोटबंदी, रूपये की गिरती वैल्यू और जीएसटी। इन मुद्दों को लेकर बीजेपी बैकफुट पर है। कांग्रेस को चाहिए था इन मुद्दों पर अपनी पूरी ताकत झोंके लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के जाल में उलझकर उसने राफेल डील का मुद्दा उठायाजिसका अंत में फायदा बीजेपी को मिलेगा और साख कांग्रेस की गिरेगी।

Related Stories:

RELATED राफेल डील पर भाजपा ने कांग्रेस पर लगाया भ्रम फैलाने का आरोप, जानिए और क्या कहा?