रुपए की कीमत में गिरावट से बढ़ रहीं भारतीय अर्थव्यवस्था की चिंताएं

11 सितम्बर को भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का आकार 400 अरब डॉलर के स्तर से भी कम हो गया और इसमें आने वाले दिनों में और अधिक तेजी से कमी आने की आशंका है। इसके साथ ही 10 सितम्बर को रुपया डॉलर के मुकाबले 72.45 के निम्नतम स्तर पर आ गया है तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 77 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। इसके साथ-साथ अमरीका और चीन के बीच ट्रेड वार की आशंका बढऩे के कारण दुनिया के शेयर बाजारों में बिकवाली बढ़ गई। अमरीका ने कहा है कि वह चीनी उत्पादों पर अतिरिक्त 267 अरब डॉलर का टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहा है। 

गौरतलब है कि हाल ही में बैंक ऑफ  अमरीका मेरिल लिंच ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में अमरीका और चीन के बीच व्यापार युद्घ के और गहराने की संभावना को रेखांकित किया है। कहा गया है कि इन दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध के कारण डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है और दुनिया के अधिकांश देशों की मुद्राएं कमजोर हो रही हैं। इससे दुनियाभर में शेयर बाजार, मुद्रा बाजार और सोयाबीन तथा कोयले सहित जिंस बाजारों में लगातार गिरावट आ रही है। चूंकि भारत की तुलनात्मक रूप से डॉलर पर ऋण निर्भरता कम है, इसलिए डॉलर की मजबूती का अन्य देशों की तुलना में भारत पर असर कम पड़ा है, लेकिन अब जैसे-जैसे  डॉलर और मजबूत होता जा रहा है, वैसे-वैसे रुपए की कीमत में तेज गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था की चिंताएं बढ़ा रही है। 

नि:संदेह डॉलर में तेजी वैश्विक कारोबारी जंग का परिणाम है। वस्तुत: अमरीका ने जनवरी 2018 में कुछ चीनी उत्पादों पर आयात शुल्क लगाकर व्यापार युद्ध की शुरूआत की। इसके जवाब में चीन ने भी अमरीकी वस्तुओं पर आयात शुल्क लगा दिए। धीरे-धीरे ये दोनों देश एक-दूसरे से आयात होने वाली कई वस्तुओं पर आयात शुल्क आरोपित करते गए। इस व्यापार युद्ध से भारी हानि की आशंका को देखते हुए अमरीका व चीन ने विगत 24 अगस्त को समाधान वार्ता आयोजित  की लेकिन इस वार्ता का कोई परिणाम नहीं निकला। 

इस वार्ता के विफल होने के बाद यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि अमरीका और चीन के बीच व्यापार संबंध दोनों देशों के व्यापारिक इतिहास के सबसे बुरे दौर में पहुंच गए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध गहराने की आशंका बढ़ती जा रही है। इन दोनों देशों ने जैसे को तैसा की रणनीति अपनाते हुए एक-दूसरे के सामानों पर जनवरी से 10 सितम्बर तक कोई 100 अरब डॉलर का आयात शुल्क थोप दिया है। अब अमरीका ने कहा है कि वह चीन से आयात होने वाले 267 अरब डॉलर मूल्य के सामान को निशाना बना सकता है। यह राशि पिछले साल चीन से किए गए आयात के लगभग आधी है। दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे पर बढ़-चढ़कर आयात शुल्क लगाने से यह आशंका पैदा हो गई है कि अगर लड़ाई लम्बी चली तो फिर इससे वैश्विक व्यापार, निवेश और वृद्धि को गहरा झटका लग सकता है।

यदि हम मौजूदा वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को देखें तो पाते हैं कि डॉलर की लगातार मजबूती से वैश्विक परिदृश्य पर आर्थिक एवं वित्तीय ङ्क्षचताएं उभरती दिखाई दे रही हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी डॉलर का संकट चिंता का कारण बना दिखाई दे रहा है। दुनिया के बाजारों पर डॉलर की मजबूती का भारी दबाव दिखाई दे रहा है। डॉलर की मजबूती से दुनिया के कई देशों के शेयर बाजार लगातार गिरावट दिखा रहे हैं और कई देशों की मुद्राओं में डॉलर के मुकाबले लगातार बड़ी गिरावट दर्ज की जा रही है। यद्यपि अमरीका और कनाडा भी उत्तर अमरीकी मुक्त व्यापार समझौते (नाफ्टा) में बदलाव पर चर्चा पुन: शुरू कर रहे हैं लेकिन ट्रम्प की जवाबी कार्रवाई के बावजूद प्रमुख मुद्दों पर कनाडा के पीछे हटने की संभावना नहीं है। 

स्थिति यह है कि यूरोपीय शेयर बाजार कमजोर पड़कर 2 महीने के निचले स्तर पर आ गए हैं। एशिया में शेयरों में कमजोरी दर्ज की गर्ई है। हाल ही में दक्षिण अफ्रीका द्वारा जारी किए गए आंकड़े यह बता रहे हैं कि 2009 के बाद पहली बार दक्षिण अफ्रीकी अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ रही है। इंडोनेशिया की मुद्रा रुपियाह वर्ष 1998 के वित्तीय संकट के बाद अब सबसे निचले स्तर पर है। इसी तरह मैक्सिको और अर्जेंटीना की मुद्रा में भी लगातार गिरावट आ रही है। वैश्विक वृद्धि के परिदृश्य पर संकेत दिख रहे हैं कि आगामी महीनों में वृद्धि की रफ्तार सुस्त पड़ेगी, खासकर विकासशील देशों की चिंताएं विकास दर के मामले में बढ़ेंगी। जिस तरह से दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं मजबूत डॉलर से प्रभावित हो रही हैं, उसी तरह भारतीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। 

नि:संदेह डॉलर मजबूत होने से कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ता जा रहा है। भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी तेल आयात करता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भी रुपए के मूल्य में गिरावट का प्रमुख कारण हैं। जैसे-जैसे वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि हो रही है, वैसे-वैसे भारत में पैट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि देश के करोड़ों लोगों की मुश्किलों का कारण बन रही है। अर्थविशेषज्ञों का कहना है कि रुपए में लगातार गिरावट से 2018-19 में देश का कच्चे तेल का आयात बिल 26 अरब डॉलर से बढ़कर 114 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। 

ऐसे में पैट्रोल-डीजल की कीमतें बढऩे से अधिकांश वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। आयातित सामान, खासतौर पर इलैक्ट्रॉनिक उत्पाद और मोबाइल फोन के दाम भी बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। कच्चे तेल के तेजी से बढ़ते हुए आयात बिल और विभिन्न वस्तुओं के तेजी से बढ़ते हुए आयात के कारण देश में डॉलर की मांग बढ़ गई है। देश से निर्यात के धीमी गति से बढऩे और विदेशी निवेशकों के द्वारा नए निवेश की कमी के कारण भी डॉलर की आवक कम हो गई है। चालू वित्तीय वर्ष 2018-19 में चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) के 2.5 फीसदी के करीब पहुंच सकता है, जो पिछले वित्त वर्ष में 1.9 फीसदी था। चूंकि डॉलर में निवेश दुनिया में सबसे सुरक्षित निवेश माना जा रहा है, अतएव दुनिया के निवेशक बड़े पैमाने पर डॉलर की खरीद करते दिखाई दे रहे हैं। 

भारत का शेयर बाजार भी डॉलर की मजबूती से प्रभावित हो रहा है। विदेशी निवेशक भारत के शेयर बाजार से निवेश निकालते हुए दिखाई दे रहे हैं। जिस तरह प्रतिकूल आॢथक परिवेश में भी भारत का शेयर बाजार तेजी से आगे बढ़ा है, वहीं इसमें आए दिन उतार-चढ़ाव भी दिखाई दे रहे हैं। 10 सितम्बर को सैंसेक्स 467 अंक की गिरावट के साथ 37922 अंक पर बंद हुआ। यह शेयर बाजार की बहुत बड़ी गिरावट रही और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के शेयरों की कुल वैल्यू 2.32 लाख करोड़ रुपए कम हो गई। ऐसे में शेयर बाजार में छोटे शेयर निवेशकों के हितों की सुरक्षा एक बड़ी जरूरत है। शेयर बाजार के विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि देश में आर्थिक सुधारों के बाद अब जिस तरह से बड़े पैमाने पर शेयर बाजार में लम्बे समय  से सुस्त पड़ी हुई कम्पनियों के शेयरों की बिक्री 2008 के बाद हाल ही के दिनों में सर्वाधिक रूप से बढ़ी है, उससे शेयर बाजार में जोखिम भी बढ़ गया है। 

उल्लेखनीय है कि मई 2018 से जुलाई 2018 के 3 महीनों में स्मॉल और मिड-कैप कम्पनियों के शेयरों, यानी छोटे शेयरों की कीमतों में कोई 40 फीसदी से ज्यादा की जो अप्रत्याशित गिरावट आई है, उससे अनुचित व्यापार-व्यवहार के उल्लंघन का संदेह पैदा होता है। यद्यपि डॉलर की मजबूती से देश की आर्थिकचुनौतियां बढ़ रही हैं लेकिन फिर भी इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था कम जोखिम वाली अर्थव्यवस्था बनी हुई है। भारत के लिए अच्छा आधार यह है कि इसकी डॉलर पर ऋण निर्भरता कम है इसलिए डॉलर की मजबूती का अन्य देशों की तुलना में भारत पर असर कम पड़ रहा है, साथ ही आॢथक मामलों में भारत की जो रेटिंग सुधरी हुई है उससे भी अर्थव्यवस्था की मुश्किलें कम हैं लेकिन जिस तेजी से डॉलर के मूल्य में बेतहाशा मजबूती आ रही है, उसके दुष्परिणामों के तहत रुपए की कीमत और शेयर बाजार में गिरावट को रोकने तथा विदेशी मुद्रा कोष का स्तर बनाए रखने के लिए कई कदम उठाने जरूरी हैं। 

हम आशा करें कि सरकार डॉलर की लगातार मजबूती से भारतीय अर्थव्यवस्था पर पडऩे वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिए सुनिश्चित कदम उठाएगी। वैश्विक संरक्षणवाद की नई चुनौतियों के बीच सरकार को निर्यात प्रोत्साहन के लिए और अधिक कारगर कदम उठाने होंगे। देश से निर्यात बढ़ाने के लिए कम से कम कुछ ऐसे देशों के बाजार भी जोड़े जाने होंगे जहां गिरावट अधिक नहीं है। सरकार द्वारा भारतीय उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बनाने वाले सूक्ष्म आर्थिक सुधारों को लागू किया जाना होगा। सरकार रुपए की कीमत में गिरावट को निर्यात बढ़ाने के एक अवसर के रूप में परिवर्तित करेगी। खासतौर से अमरीका एवं चीन के बीच व्यापार युद्ध के कारण इन दोनों देशों में जो निर्यात संभावनाएं उभरकर सामने आई हैं, उन्हें मुट्ठी में करने के लिए शीघ्रतापूर्वक आगे बढऩा होगा। 

सरकार और सेबी के द्वारा शेयर बाजार पर सतर्क निगाहें रखी जानी होंगी। भारतीय शेयर बाजार में छोटे निवेशकों के हितों और उनकी पूंजी की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना होगा। रुपए की कीमत को और अधिक गिरने से बचाने तथा पैट्रोल-डीजल की महंगाई पर कारगर नियंत्रण के लिए रणनीतिक कदम उठाए जाने होंगे। हम आशा करें कि सरकार देश के विदेशी मुद्रा भंडार के तेजी से घटते हुए आकार के मद्देनजर कोई 30 से 35 अरब डॉलर की एन.आर.आई. डिपॉजिट स्कीम लाने जैसे कदमों की शीघ्र घोषणा करेगी ताकि डॉलर की आमद बढ़ सके और अर्थव्यवस्था की ङ्क्षचताएं कम हो सकें।-डा. जयंतीलाल भंडारी

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