देवी मां के इस अद्भुत मंदिर में चोरी करने पर होती है पुत्र की प्राप्ति

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आपने ऐसे कई मंदिरों के बारे में सुना होगा जहां चोरी हुए सामान के मिलने की मन्नते मांगी जाती हैं। लेकिन क्या आपने किसी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है जहां चोरी करने पर ही मनोकामनाएं पूरी होती हैं। जी हां, सुनने में थोड़ा आश्रर्यजनक लगे लेकिन ये सच है। हम जानते हैं ये बात सुनने के बाद हर एक इंसान के दिलो-दिमाग में एक ही सवाल आया होगा कि चोरी करना तो बहुत बुरी बात होती है। फिर ऐसे कैसे किसी मंदिर में चोरी करने स मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं। लेकिन ये जानने के बाद कि ऐसा मंदिर है भारत में आप शायद अपने दांतों तले ऊंगली दबा लेंगे। तो आइए जानते हैं इस मंदिर की चोरी करने की अनोखी प्रथा के बारे में-


हिंदू धर्म की मानें चोरी करना पाप कहलाता है, तो अगर कोई मंदिर में चोरी करे तो फिर ये तो महापाप कहलाएगा। परंतु एक ऐसा मंदिर है जहां ऐसा करना पाप नहीं माना जाता बल्कि ऐसा करने से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। बता दें कि ये मंदिर उत्तराखंड में स्थित है, जो सिद्धपीठ चूड़ामणि देवी मंदिर  के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि यहां चोरी करने पर ही व्यक्ति की मनोकामना पूरी होती है।

रुड़की के चुड़ियाला गांव में स्थित प्राचीन सिद्धपीठ चूड़ामणि देवी मंदिर में जिन पुत्र प्राप्ति की इच्छा को पूरी करने के लिए है यहां पर पति-पत्नी माथा टेकने आते हैं। मंदिर के बारे में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार जिन शादीशुदा दंपति को पुत्र की चाहत होती है अगर वह इस मंदिर में आकर माता के चरणों में पड़ा लकड़ी का गुड्डा चोरी करके अपने साथ ले जाएं तो उनकी पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूरी होती है। कहते हैं जब उनकी ये इच्छा प्राप्त हो जाती है तब बेटे के साथ माता-पिता को यहां माथा टेकने आना पड़ता है। ऐसा बताया जाता है कि पुत्र होने पर भंडारा करवाने के साथ दंपति आषाढ़ की महीने में ले जाए हुए लकड़ी के गुड्डे के एक और लकड़ी का गुड्डा अपने पुत्र के हाथों से अर्पित करवाते हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो मंदिर का निर्माण 1805 में लंढोरा रियासत के राजा ने करवाया था।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कई साल पहले एक राजा हुआ करता था जिसकी कोई संतान नहीं थी। एक दिन वह राजा मंदिर के पास के जंगल में शिकार करने आया जहां उसे मां की पिंडी के दर्शन हुए। कहते हैं यहां दर्शन करने के बाद उसने पुत्र की कामना की, जिसके कुछ ही दिन बाद उसे पुत्र की प्राप्ति हो गई थी। इसी घटना के बाद राजा ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। 
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