कांग्रेस शासित राज्यों में भाजपा के लिए वापसी करना चुनौती

इलेक्शन डेस्क:लोकसभा की आधी से ज्यादा सीटों पर वोटिंग हो चुकी है। 2014 के चुनाव में भाजपा ने उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत में अप्रत्याशित सफलता हासिल की थी। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में तो उसका स्ट्राइक रेट चौंका देने वाला था। बाकी राज्यों में भी उसका प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा। 

कई सर्वे बताते हैं कि कांग्रेस शासित राज्यों में भाजपा के लिए वापसी करना चुनौतीपूर्ण होगा। खासकर दिसम्बर में ङ्क्षहदी हार्टलैंड के जिन 3 राज्यों यू.पी., एम.पी. और राजस्थान में कांग्रेस ने भाजपा का तख्तापलट किया है उससे इस आशंका को और बल मिला है। भाजपा का भाग्य इन बड़े राज्यों पर निर्भर करेगा जहां उसे कांग्रेस और क्षेत्रीय दल कड़ी टक्कर दे रहे हैं। 

किन राज्यों में है बड़ी चुनौती 
एम.पी., यू.पी. व राजस्थान में कहीं पर उसका सीधे कांग्रेस से मुकाबला है तो कुछ जगहों पर क्षेत्रीय पाॢटयों से सामना हो रहा है। अगर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की कुल 143 सीटों की बात करें तो अभी भाजपा के पास इनमें से 118 सीटें हैं। भाजपा को पश्चिम बंगाल से ज्यादा उम्मीदें हैं। महाराष्ट्र में एन.डी.ए. का प्रदर्शन पिछली बार बहुत अच्छा रहा था और उसने 41 सीटें जीती थीं। कर्नाटक में भाजपा के विस्तार की ज्यादा संभावना दिख नहीं रही क्योंकि वहां कांग्रेस और जे.डी.एस. में तालमेल हो चुका है। 

क्या कहता है पुराना ट्रैंड?  :कांग्रेस को भरोसा है कि वह मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पिछले साल दिसम्बर वाली परफॉर्मैंस लोकसभा चुनावों में भी बरकरार रखेगी। पुराना ट्रैंड यह कहता है कि अगर विधानसभा चुनावों के साल भर के अंदर लोकसभा चुनाव होता है तो राज्यों में जीतने वाली पार्टी ही लोकसभा का चुनाव भी जीतती है और उसका वोट शेयर भी ज्यादा हो जाता है। 1998 के बाद 6 बड़े राज्यों में ऐसा ही ट्रैंड देखने को मिला है। 

पार्टियों के ट्रैंड में भी है अंतर 
विधानसभा और लोकसभा चुनावों के परिणामों में ट्रैंड का अंतर पार्टियों के आधार पर भी अलग-अलग देखा गया है। जिन 23 केसों में 18 पर पार्टी ने अपना एसैंबली चुनाव वाला प्रदर्शन लोकसभा चुनावों में भी दोहराया उनमें से 15 बार यह सफलता भाजपा के खाते में दर्ज की गई है। सिर्फ एक बार ऐसा हुआ है जब भाजपा विधानसभा में तो जीती लेकिन एक साल के भीतर वहां लोकसभा चुनाव हुए तो उसे हार का सामना करना पड़ा जबकि कांग्रेस के साथ ऐसा 3 बार हो चुका है। 

राजस्थान और मध्य प्रदेश में क्या होगा? 
मध्य प्रदेश में कांग्रेस का संगठन अभी भी भाजपा के मुकाबले कमजोर है। कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह जैसे बड़े नेताओं के बीच गुटबाजी जगजाहिर है। राजस्थान में भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के समर्थकों में मतभेद बहुत गहरा है। पार्टी में एक वर्ग तो तमाशबीन ही नजर आता है। इन मामलों में भाजपा कांग्रेस पर भारी पड़ती दिख रही है। 

इस बार क्या है संभावना? 
विधानसभा चुनावों में वोटर यह देखते हैं कि सी.एम. कौन है या कौन बन सकता है। स्थानीय मुद्दे क्या हैं। एंटी इन्कम्बैंसी फैक्टर का रोल बहुत ही ज्यादा रहता है लेकिन आम चुनावों में आमतौर पर राष्ट्रीय मुद्दे हावी रहते हैं। इसमें देश का प्रधानमंत्री चुना जाता है। उम्मीदवार भी अहम रोल निभाते हैं। अब यह देखने वाली बात होगी कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों का प्रदर्शन आम चुनाव में भी दोहराने का कांग्रेस का दावा कितना कारगर होता है। 

5 चेहरे हिंदी हार्टलैंड में बिगाड़ सकते हैं भाजपा का खेल 

शत्रुघ्न सिन्हा
भाजपा छोड़ शत्रुघ्न सिन्हा पटना साहिब सीट से कांग्रेस प्रत्याशी हैं। उनके सामने भाजपा के केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद हैं। माना जा रहा है कि बिहारी बाबू महज अपनी ही सीट पर नहीं अन्य जगहों पर भी भाजपा को नुक्सान पहुंचाएंगे। 

कीर्ति झा आजाद
पूर्व भाजपा सांसद कीर्ति झा आजाद ने कांग्रेस ज्वाइन कर ली है।  भाजपा से खार खाए कीर्ति नुक्सान पहुंचाने का भरसक प्रयास करेंगे।

श्यामाचरण गुप्ता
पूर्व भाजपा सांसद श्यामाचरण गुप्ता सपा टिकट पर बांदा से लड़ रहे हैं। लिहाजा इस सीट पर गठबंधन प्रत्याशी के रूप में वह भाजपा को नुक्सान पहुंचा सकते हैं।

सावित्री बाई फूले
सावित्री बाई फूले कांग्रेस के टिकट पर बहराइच से मैदान में हैं। वह भी भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती हैं।

मनीष खंडूरी
भाजपा से टिकट न मिलने पर मनीष खंडूरी उत्तराखंड की पौड़ी लोकसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं।  वह भी भाजपा को नुक्सान पहुंचा सकते हैं। 

           

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