बुराड़ी केस: सगा हो या अजनबी, ऐतबार करने से पहले हजार बार सोचें

नई दिल्ली: बुराड़ी में 11 लोगों की एक साथ मौत। सभी की लाशें बड़ी विचित्र स्थिति में लटकी पाई गईं। फांसी पर लटकी लाशों का शरीर तारों से बंधा था। हाथ बंधे थे, मुंह और आंखों पर डॉक्टर टेप लपेटी गई थी। शव घर की पहली मंजिल की छत पर बने जाल से लटक रहे थे। देखकर खौफ पैदा करने वाल मंजर था यह सब। अब तक दिल्ली इस तरह की घटना से दो-चार नहीं हुई थी। बुराड़ी का संतनगर क्या, पूरा हिन्दुस्तान इस तरह की घटना सुनकर सन्न रह गया। ऐसी घटना शायद पहले कभी हुई नहीं न ही कभी किसी ने ऐसा खौफनाक मंजर देखा होगा। एक घर में 11 लाशें फांसी पर लटकी हुईं। जिसमें दो सगे भाई उनकी पत्नियां, उनके बच्चे, भाइयों की मां, एक विधवा बहन और उसकी बेटी शामिल थीं। यह परिवार पैसे से मजबूत था और किसी तरह कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन, आत्मा, मोक्ष और तंत्र आदि के चक्कर में पड़कर यह परिवार काल के गाल में समा गया।

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तांत्रिक क्रिया के तहत सभी ने आत्महत्या की या फिर कुछ और हुआ या सभी किसी चमत्कार के होने पर बच जाने के विश्वास या यूं कहें कि अंध विश्वास में बंध से गए थे। जो फांसी पर झूल गए या झुला दिए गए। सच्चाई जो कुछ हो, एक बात साफ है कि परिवार में मुख्य भूमिका निभाने वाले छोटा भाई ललित आत्मा और तंत्र के चक्कर में था। जैसा कि पता चला है कि वह कहता था कि उस पर उसके पिता की आत्मा आती है। वह पिता की आवाज में परिवार वालों से बात करता था। वह जो कुछ कहता था उसको परिवार का कोई सदस्य एक रजिस्टर में लिखता था। वह असामान्य मानसिक हालत (जिसे ललित पिता की आत्मा को आना मानता था) में जो कुछ कहता, वैसा ही वह सामान्य स्थिति में आने के बाद करता और परिवार वाले भी उसे मानते। इसी प्रक्रिया में मौत का रजिस्टर तैयार हो गया और बरगद पूजा के नाम पर जो कुछ हुआ वह जगजाहिर है। 11 मौतों ने सबको हिलाकर रख दिया। 
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घर का मुखिया ही क्यों न हो, उसे समझाएं, इलाज कराएं
बुराड़ी कांड में एक बात साफ है कि पूरा परिवार तंत्रमंत्र और आत्मा के चक्कर में पड़ गया था। सभी परिवार के प्रमुख ललित के कहने में आ गए थे। यहीं पर समझने वाली बात है, ऐसा नहीं है कि सभी के सभी सदस्य आत्मा की बातों पार विश्वास करते रहे होंगे। लेकिन, ललित ने जिस तरह से उन सभी को अपनी बातों में फंसाकर विश्वास दिलाया, सभी अंध विश्वास में फंसते गए। गलती यहीं हो गई। जब पहली बार ललित ने इस तरह की हरकत की थी, उसी समय इस समस्या का सही इलाज खोजने की जरूरत थी। मानसिक चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए थी। इलाज नियमित रूप से कराना चाहिए था। साथ ही ललित को समझना चाहिए था। यदि इसके बावजूद स्थिति नहीं संभलती तो बीमार व्यक्ति को घर से ले जाकर मानसिक अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए। सही तरीका तो यही है, लेकिन जब कोई अपना इस तरह की समस्या का शिकार होता है तो परिजनों को समझ में नहीं आता कि वह क्या करें। जैसा कि बुराड़ी कांड में हुआ। घर के सभी अन्य दस सदस्य ललित की बातों में आते गए और हुआ क्या? एक घर और 11 लाशें। 
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पढ़ लिखकर भी इस तरह की नासमझी
ऐसा नहीं था कि ललित का परिवार पुराने जमाने का था। घर में पढ़े-लिखे सदस्य थे। उसकी विधवा बहन की बेटी प्रियंका तो एमबीए करके मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी कर रही थी। वह भी मामा की बातों में आ गईं। बताया गया है कि असामान्य स्थिति होने पर जो कुछ ललित बोलता था, वह प्रियंका ही रजिस्टर में नोट करती थी। जो कुछ ललित बोलता था, वह सब उसके दिमाग में कहां से आता था, या अचेतन मन कौन सा हिस्सा जाग जाता था जो वह कहानी जैसी बातें जो तंत्रमंत्र पर आधारित होती थी, उनको बोलने लगता था। यह सब तो मनोरोग विशेषज्ञ ही बता सकते हैं, लेकिन एक बात तो तय है कि यह सब सामान्य नहीं था। ऐसे में ललित के प्रमुख होने की बात छोड़कर परिजनों को चाहिए था कि उसका इलाज कराते। लेकिन, लापरवाही बरती गई वह भी सालों साल और उसका दुष्परिणाम मौतों के रूप में सामने आया।

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सजग रहने की सलाह
-जब भी किसी असामान्य स्थिति से सामना हो, उसका सही निदान खोजें
-दीमाग या शरीर की समस्या हो, संबंधित चिकित्सक को ही दिखाएं 
-कभी तांत्रिक या बाबा आदि के चक्कर में नहीं पड़ें, अंजाम बुरा होता है
- कहीं, आत्मा के नाम पर शोषण की बात पता चले तो पुलिस को बताएं

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अरमानों का हो गया खून
ललित की भांजी अपनी विधवा मां के साथ ललित के परिवार में ही रहती थी। बीते 17 जून को उसकी सगाई हुई थी। वह शादी के अरमान सजाए हुए थे, लेकिन उसके सपनों का खून हो गया। वह बहुत कुछ करना चाहती थी, बड़ी कंपनी में बड़ा पद पाना उसका मकसद था। एमबीए करके वह उसी रास्ते पर चल भी रही थी, लेकिन घर में चल रही बेतुकी और आत्मा वाली मामा की कहानी का सच वह समझ नहीं सकी। वह मामा की स्थिति का प्रबंधन नहीं कर सकी या यूं कहें कि वह मामा के चक्कर से खुद को और परिवार को निकाल नहीं सकी। जिसका कितना भयावह अंजाम सामने आया।


 

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