मौके पर चौका मारने में नाकाम रही भाजपा

श्रीनगर (बलराम): जम्मू-कश्मीर की सत्ता में सहयोगी पी.डी.पी. से समर्थन वापस लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आज अपनी पीठ थपथपाने का प्रयास जरूर कर रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि करीब साढ़े 3 वर्ष तक सत्ता में बने रहने के लिए उसने राष्ट्रीय हित के बहुत से मुद्दों की बलि चढ़ाई है। ज्यादा प्रभावशाली यह होता कि भाजपा इतना नुक्सान होने का इंतजार किए बिना पी.डी.पी. से समर्थन वापस लेती तो स्थिति कुछ और होती।

उस समय वास्तव में आम जनता को भी महसूस होता कि भाजपा अपने मूल सिद्धांतों से समझौता करने वाली पार्टी नहीं है, लेकिन आज की समर्थन वापसी तो ‘नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली’ वाली कहावत की याद दिला रही है, बेशक इस कदम से भी भाजपा को राजनीतिक लाभ मिल पाए, लेकिन सही मायनों में भाजपा मौके पर चौका लगाने में नाकाम साबित हुई है। रमजान के दौरान संघर्ष विराम को लेकर भाजपा के समक्ष वर्ष 2000-01 का तत्कालीन वाजपेयी सरकार का विफल मॉडल मौजूद था, जिसमें सुरक्षा बलों के सैंकड़ों जवानों और आम नागरिकों को अपनी जान कुर्बान करनी पड़ी। इसके बावजूद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को खुश करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत एवं भाजपा की जम्मू-कश्मीर इकाई की आपत्ति को दरकिनार करते हुए रमजान माह के दौरान संघर्ष विराम की घोषणा कर एक बार फिर विफल प्रयोग करने की ठान ली। अच्छा तो यह होता कि भाजपा संघर्ष विराम करने की बजाय इस मुद्दे पर पी.डी.पी. से अलग हो जाती। 



इससे पहले, कठुआ जिले के रसाना गांव में हुए दुष्कर्म एवं हत्याकांड को लेकर भारत को दुनियाभर में फजीहत झेलनी पड़ी और इस मामले को सही ढंग से हैंडल न करने को लेकर भाजपा को अपने जनाधार वाले जम्मू संभाग एवं देश के अन्य भागों में किरकिरी करवानी पड़ी।जम्मू संभाग के लोगों विशेषकर इस मामले के आरोपियों द्वारा खुद के नार्को टैस्ट तक का प्रस्ताव रखने के बावजूद मुख्यमंत्री अपनी जिद पर अड़ी रहीं और इस मामले की सी.बी.आई. जांच के लिए तैयार नहीं हुईं। भाजपा इस मुद्दे पर महबूबा मुफ्ती के दबाव में आकर अपने 2 मंत्रियों चौ. लाल सिंह और चंद्रप्रकाश गंगा की कुर्बानी देने की बजाय सी.बी.आई. जांच को लेकर अपना रुख स्पष्ट कर सकती थी।

यदि फिर भी मुख्यमंत्री न मानती तो समर्थन वापस ले सकती थी।  ये 2 घटनाएं ही नहीं, बल्कि अन्य तमाम मुद्दों को लेकर भी भाजपा को जम्मू संभाग की कुल 37 में से 25 सीटों पर विजयी कर राज्य की सत्ता के मुहाने तक पहुंचाने वाली राष्ट्रवादी जनता भगवा दल द्वारा अपने मूल सिद्धांतों को तिलांजलि देने और पी.डी.पी. के प्रति समर्पण भाव को लेकर न केवल निराश थी, बल्कि चिंतित भी थी। हद तो तब हो गई, जब केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने 27 मार्च को लोकसभा में यह स्पष्ट कर लोगों की रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया कि केंद्र सरकार का जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने वाली भारतीय संविधान की धारा-370 को हटाने का कोई विचार ही नहीं है।


 इससे पहले, पी.डी.पी.-भाजपा गठबंधन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में शपथ-पत्र दाखिल कर धारा-370 को मजबूती प्रदान करने वाले अनुच्छेद 35-ए को चुनौती देने वाली याचिका का डटकर विरोध किया गया है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बार-बार तलब किए जाने के बावजूद राज्य में अपनी सत्ता बचाने के लिए केंद्र सरकार अपना पक्ष रखने से कतराती रही। इसके अलावा भी मामला चाहे ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट में विवादास्पद संशोधन विधेयक का हो या माता वैष्णो देवी, पवित्र अमरनाथ गुफा एवं मचैल में चंडी माता के दर्शनों के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की हैलीकॉप्टर सेवा पर सर्विस टैक्स लगाने का, भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में नए जिले न बना कर असंतोष पैदा करने का हो या जनसंघ (वर्तमान भाजपा) के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के संदिग्ध परिस्थितियों में हुए निधन की जांच का, तमाम मामलों में भाजपा बैकफुट पर ही नजर आई है। 

ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट में संशोधन भी बना विवादास्पद 
इसके बाद भाजपा तत्कालीन राजस्व मंत्री सईद बशारत अहमद बुखारी को ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट में संशोधन के लिए विवादास्पद विधेयक विधानसभा में पेश करने से नहीं रोक पाई। हालांकि ‘पंजाब केसरी’ द्वारा इस विधेयक की खामियां उजागर किए जाने के बाद सकते में आई भाजपा ने बीच-बचाव के रास्ते ढूंढते हुए इसे सदन की चयन समिति को भेजने की अनुशंसा कर दी। 

इन मुद्दों पर भाजपा -पी.डी.पी. में बढ़ी थी तकरार
-बार-बार पत्थरबाजों  के  खिलाफ दर्ज मामले वापस  लेना
-2008 के अमरनाथ भूमि आंदोलन के आरोपियों के खिलाफ दर्ज मामले वापस न लेना
-धारा 35-ए पर सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखना
-रोहिंग्या-बंगलादेशी मुसलमानों की वापसी
-राज्य मंत्रिमंडल को विश्वास में लिए बिना गुज्जर-बकरवालों के लिए नई आदिवासी नीति बनाकर उन्हें अतिक्रमण की खुली छूट देना
-जम्मू क्षेत्र में जनसांख्यिकीय असंतुलन बिगडऩा
-वैस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजियों को नागरिक अधिकार न देना और जम्मू एवं कश्मीर संभागों के बीच सत्ता असंतुलन को समाप्त करने के लिए विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन न करना

संस्थापक की संदिग्ध हालात में मौत तक को भूल गए भाजपा नेता
वर्ष 1953 में जनसंघ के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर प्रजा परिषद के संस्थापक पं. प्रेमनाथ डोगरा के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों से अलग करने वाले ‘दो प्रधान, दो विधान एवं दो निशान’ के खिलाफ जनांदोलन शुरू किया था। राज्य में बिना परमिट प्रवेश करने पर तत्कालीन शेख अब्दुल्ला सरकार द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर श्रीनगर जेल में डाला गया और जेल में ही संदिग्ध परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। अब सत्ता में आने के बाद भाजपा न केवल अपने संस्थापक डा. मुखर्जी द्वारा जम्मू-कश्मीर को देश के साथ जोड़कर सामान्य राज्य बनाने के सिद्धांत को भूल चुकी है, बल्कि उनकी महान कुर्बानी को भी भूल चुकी है, तभी तो केंद्र एवं राज्य दोनों स्थानों पर सत्ता में आने के बावजूद भाजपा द्वारा डा. मुखर्जी की असमय मृत्यु की निष्पक्ष जांच के लिए कोई पहल नहीं की गई। 

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