महबूबा को महंगी पड़ी भाजपा की फजीहत

श्रीनगर(बलराम): जम्मू-कश्मीर में गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही पी.डी.पी. अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती को अपनी सहयोगी भाजपा की हर कदम पर फजीहत करवाकर अपनी पार्टी की राजनीतिक पैठ मजबूत करने की कवायद बहुत महंगी पड़ी। इस पूरे घटनाक्रम में उनकी पार्टी को कितना फायदा हुआ, यह तो आगामी चुनाव के नतीजों से ही पता चलेगा, लेकिन फिलहाल सरकार गिराने में उनको तत्कालिक नुक्सान तो उठाना पड़ेगा। 

विभिन्न मुद्दों पर महबूबा के हाथों हुई यह फजीहत ही थी, जिसके चलते चौतरफा दबाव में आकर भाजपा नेतृत्व को पी.डी.पी. से समर्थन वापसी का निर्णय लेने पर मजबूर होना पड़ा, अन्यथा पूरे भारत के मानचित्र को भगवा रंग में रंगने का ख्वाब पाले बैठे भाजपा नेतृत्व के लिए यह निर्णय लेना इतना आसान नहीं था। कश्मीर घाटी विशेष तौर पर अपने गढ़ यानी दक्षिणी कश्मीर के 4 जिलों में बिगड़े हालात एवं निरंतर खिसकते अपने जनाधार के चलते पी.डी.पी. नेतृत्व इस समय चुनाव के लिए तैयार नहीं है। भाजपा नेतृत्व भी समझता है कि महबूबा के तमाम मनमाने फैसलों से पी.डी.पी. को भले ही कोई फायदा हो या न हो, लेकिन इन फैसलों पर केंद्र सरकार के रुख से राष्ट्रवादी, हिन्दी-डोगरी भाषी एवं हिन्दू बहुल क्षेत्रों में भाजपा के जनाधार में दूसरी पार्टियों द्वारा सेंध लगाए जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, इसलिए उसने भी समर्थन वापस लेकर पी.डी.पी. को करारा झटका दिया है।  

वर्तमान हालात में महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में पी.डी.पी. हर चुनाव से भाग रही है, तभी तो मुख्यमंत्री अपना गृह क्षेत्र होने के बावजूद अनंतनाग संसदीय क्षेत्र में उप-चुनाव को बार-बार सुरक्षा का हवाला देकर स्थगित करवा रही हैं। इसके अलावा राज्यपाल एन.एन. वोहरा की बार-बार सिफारिश के बावजूद पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों के चुनावों को बार-बार स्थगित किया जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि महबूबा फिलहाल किसी भी स्तर पर चुनाव का सामना करने के लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कश्मीर घाटी के बिगड़े हालात के मद्देनजर श्रीनगर संसदीय क्षेत्र में हुए उप-चुनाव की तरह कहीं दूसरे चुनावों में भी नैशनल कांफ्रैंस बाजी न मार ले। ऐसे में, वह भाजपा से नाता तोड़ कर अभी सरकार गिराने का जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं थीं। 

इसके बावजूद महबूबा मुफ्ती बड़ी चालाकी से जम्मू और कश्मीर दोनों संभागों में न केवल अपने खिसकते जनाधार को बचाने का प्रयास कर रही थीं, बल्कि हिन्दू-मुस्लिम कार्ड के जरिए गुज्जर-बकरवालों की संरक्षक बन कर उन्हें पी.डी.पी. के साथ जोडऩे की जुगत भी लगा रही थीं। जम्मू में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो कठुआ दुष्कर्म एवं हत्याकांड की पीड़ित बच्ची को न्याय न दिए जाने की वकालत कर रहा हो। निश्चित रूप से हर कोई इस मामले में न्याय चाहता है, लेकिन राज्य पुलिस की अपराध शाखा द्वारा अदालत में दाखिल की गई जांच रिपोर्ट में कई खामियां उजागर होने के बाद ज्यादातर लोग इसकी सी.बी.आई. जांच पर जोर दे रहे हैं, ताकि किसी बेगुनाह को सजा न मिले। कठुआ कांड में न केवल महबूबा सी.बी.आई. जांच के खिलाफ चट्टान की तरह खड़ी हो गईं, बल्कि खुद सरकार और कुछ अन्य संस्थाओं ने सी.बी.आई. जांच की मांग करने वाले जम्मू संभाग के लोगों को ‘दुष्कर्मियों के हितैषी’ के तौर पर प्रचारित कर देश-दुनिया में बदनाम भी कर दिया। पीड़ित बच्ची की मृत्यु से पहले खींची गई जिस फोटो के आधार पर बेहद सुनियोजित ढंग से साम्प्रदायिक रंग देकर इस प्रकरण का अंतर्राष्ट्रीयकरण किया गया, वह फोटो आखिर खींची किसने थी, किसी भी जांच अधिकारी अथवा अन्य पक्ष ने इस तथ्य पर गौर ही नहीं किया।  



2 मंत्रियों को हटाने से भाजपा को हुआ दोहरा नुक्सान
पी.डी.पी. अध्यक्ष ने कठुआ कांड के माध्यम से एक तीर से कई निशाने साधने का प्रयास किया है। सी.बी.आई. जांच न करवाकर वह न केवल हुर्रियत कांफ्रैंस को संतुष्ट करने और कश्मीर में हो रहे सरकार विरोधी प्रदर्शनों का एजैंडा बदल कर इसे बच्ची को न्याय दिलाने की तरफ मोडऩे में कामयाब रहीं, बल्कि भाजपा की तरफ तेजी से बढ़ रहा गुज्जर-बकरवाल समुदाय भी जम्मू संभाग में बढ़ते साम्प्रदायिक तनाव के चलते खुद को हिन्दू बाहुल्य क्षेत्रों में असुरक्षित महसूस करने लगा। उनकी सियासी चाल में फंस कर सी.बी.आई. जांच का समर्थन करने वाले अपने 2 मंत्रियों को हटाने से भाजपा को दोहरा नुक्सान हुआ। इससे गुज्जर-बकरवाल समुदाय में तो भाजपा की पकड़ ढीली हुई ही, बल्कि उसके मूल मतदाता हिन्दुओं का भी उससे मोहभंग होने लगा है।

सरकार के प्रति लोगों में कितना रोष है, इसका अंदाजा भाजपा के पूर्व मंत्री चौ. लाल सिंह द्वारा कठुआ कांड की सी.बी.आई. जांच की मांग को लेकर हीरानगर में आयोजित डोगरा स्वाभिमान रैली की अपार सफलता से आसानी से लगाया जा सकता है। कठुआ कांड के शोर-शराबे के बीच ही मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने गुज्जर-बकरवाल समुदाय को पी.डी.पी. के साथ जोडऩे के लिए एक और चाल चली। 14 फरवरी, 2018 को हुई बैठक में उन्होंने बिना मंत्रिमंडल की मंजूरी के नई आदिवासी नीति बना कर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को गु"ार-बकरवाल समुदाय से अतिक्रमण की गई सरकारी भूमि न छुड़ाने के आदेश जारी कर दिए। इस बैठक के मिनट्स को लेकर जब मामला बढ़ा तो भाजपा ने यह कहकर अपना बचाव करने का प्रयास किया कि बैठक में ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया था, बल्कि अधिकारी की गलती से गलत मिनट्स जारी हो गए, लेकिन सरकार ने न तो मिनट्स ठीक किए और न ही कोताही बरतने वाले अधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई की। स्पष्ट है कि किसी अधिकारी ने कोई गलती की ही नहीं थी, बल्कि वास्तव में यह सरकारी निर्णय था। 

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