जम्मू -कश्मीर में राष्ट्रपति शासन के बजाए गवर्नर रूल क्यों ?

नेशनल डेस्क ( संजीव शर्मा ): बीजेपी द्वारा महबूबा मुफ्ती सरकार से समर्थन वापस लिए जाने के बाद जम्मू कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू हो गया है।  राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इसकी मंजूरी भी दे दी है। ऐसे में आपके जहन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि राष्ट्रपति शासन क्यों नहीं ? गवर्नर्स रूल क्यों ? दरअसल इसके पीछे जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान है जो किसी भी सीधे हस्तक्षेप को रोकता है। जम्मू-कश्मीर के संविधान की धारा  92 के मुताबिक संवैधानिक मशीनरी के फेल होने की स्थिति में  राजयपाल राष्ट्रपति की मंजूरी से गवर्नर रूल लगा सकते हैं।  यानी केंद्र सरकार माइनस रहती है, उसका कोई रोल नहीं होता। यह व्यवस्था छह माह तक रह सकती है। इस दैरान अगर चुनाव या दूसरे संवैधानि तरीकों से अगर  सिस्टम (सरकार) स्थापित नहीं होती है तो फिर राज्यपाल राज्य में राष्ट्रपति शासन की संस्तुति करते हैं। इन छह महीने के दौरान राजयपाल चाहें तो विधानसभा को निलंबित रखें या फिर वे विधानसभा भंग भी कर सकते हैं। 


मौजूदा प्रकरण में विधानसभा भंग नहीं हुई है यानी इसे निलंबित माना जास्गा। इस तरह से भारत के संविधान की धारा 356 और जम्मू-कश्मीर के संविधान की धारा 92 में हालांकि कोई खास अंतर नहीं है तथापि व्यवस्था के तहत गवर्नर रूल का नाम दिया जाता है। और इसके लिए सीधे गवर्नर  राष्ट्रपति  को आग्रह भेजता है। दिलचस्प ढंग से एन एन वोहरा के राजयपाल रहते ही यह चौथी बार है जब ऐसी नौबत आई हो। हालांकि सबसे लम्बे समय तक गवर्नर रूल का रिकार्ड जगमोहन के नाम है। हालांकि यह पहला मौका नहीं है, जब जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लगाया गया हो।  राज्य में अब तक सात बार राजयपाल शासन प्रतिस्थापित हो चूका है और अबके यह आठवीं बार है।  

कब-कब लगा गवर्नर रूल ? 

1.  
जम्मू-कश्मीर में पहली बार 26 मार्च से 9 जुलाई,तक  1977 में गवर्नर रूल लगाया गया था।  यह करीब 105 दिन तक जारी रहा।  उस समय   एलके झा राजयपाल थे  और तब शेख अब्दुल्ला की सरकार से कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया था।

2.  इसके बाद 6 मार्च से 7 नवंबर, 1986 के बीच 246  दिन के लिए गवर्नर रूल लगा। तब राज्यपाल जगमोहन थे, और तब भी कांग्रेस ने ही पहले फारुख अब्दुल्ला की सरकार गिराई, और फिर गुलाम मोहम्मद की सरकार बनवाई। बाद में  मार्च, 1986 में कांग्रेस ने गुलाम मोहम्मद सरकार से भी समर्थन वापस ले लिया।

3.  तीसरी बार राज्य में 19 जनवरी, 1990 से 9 अक्टूबर, 1996 तक गवर्नर रूल रहा।  यह गवर्नर रूल की सबसे लम्बी अवधि थी जो छह साल और 264 दिन तक रही।  उस समय भी राज्यपाल जगमोहन ही थे, और तब फारुख अब्दुल्ला ने जगमोहन के राज्यपाल बनाए जाने पर ऐतराज करते हुए इस्तीफा दे दिया था।

4. जम्मू-कश्मीर में चौथी बार 18 अक्टूबर से 2 नवंबर, 2002 फिर से 15  दिन के लिए गवर्नर रूल रहा। उस समय  राज्यपाल जीसी सक्सेना थे, और तब फारुख अब्दुल्ला ने केयरटेकर मुख्यमंत्री बने रहने से इनकार कर दिया था।  उसके बाद ही पीडीपी ओर कांग्रेस साथ आए थे।

5.  पांचवीं बार 11 जुलाई, 2008 से 5 जनवरी, 2009 तक करीब  178 दिन, तक गवर्नर रूल रहा।  तब एनएन वोहरा राज्यपाल थे।  उस समय गुलाम नबी आजाद की सरकार अल्पमत में चली गई थी, क्योंकि पीडीपी ने अमरनाथ के मुद्दे पर समर्थन वापिस ले लिया था। 

6.  इसके बाद 2014 चुनाव में हंग असेंबली के चलते उमर अब्दुल्ला को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद बीजेपी ने पीडीपी के साथ चुनाव बाद गठबंधन कर सरकार बनाई थी। बाद में  मुफ्ती सईद 1 मार्च 2015 को सीएम बने थे।इस दौरान 9  जनवरी 2015  को एकबार फिर से गवर्नर रूल लगा जो 51  दिन तक चला था।  

7.  सातवीं बार मुफ्ती मुहम्मद सईद की मृत्यु के बाद 8 जनवरी 2016 को गवर्नर रूल लगा जो 87 दिन तक चला जब तक की महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री नहीं बनी।

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