सुखी जीवन के लिए जरूरी है जैव विविधता संरक्षण

जैव विविधता जीवन और विविधता के संयोग से बना शब्द है जोकि पृथ्वी पर मौजूद जीवन की विविधता को दर्शाता है। जैव विविधता एक प्राकृतिक संसाधन है जिससे हमारे जीवन की सम्पूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यू.एन.ई.पी.) के अनुसार जैव विविधता आनुवांशिक, प्रजाति तथा पारिस्थितिकी तंत्र के विविधता का स्तर मापता है। 

जैव विविधता से तात्पर्य उन विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु और वनस्पति से है जो संसार में या किसी विशेष क्षेत्र में एक साथ रहते हैं। इस शब्द का प्रथम प्रयोग 1985 में डब्ल्यू.जी. रोजेन ने किया था। वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो-डी-जेनेरियो में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन के दौरान विभिन्न सदस्य देशों द्वारा हस्ताक्षरित जैव-विविधता समझौते के अनुसार स्थलीय, समुद्री तथा अन्य जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और पारिस्थितिकी परिसरों में रहने वाले सभी जीवों के बीच पाए जाने वाली असमानता को जैव विविधता के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसमें एक ही प्रजाति के जीवों के  बीच विविधता, प्रजातियों के बीच विविधता और पारितंत्रीय विविधता शामिल है। 

विश्व और भारत में कुल कितनी प्रजातियां 
एक अनुमान के अनुसार इनकी संख्या 30 लाख से 10 करोड़ के बीच है। विश्व में 14,35,662 प्रजातियों की पहचान की गई है। यद्यपि बहुत सी प्रजातियों की पहचान अभी भी होना शेष है। पहचानी गई मुख्य प्रजातियों में 7,51,000 प्रजातियां कीटों की, 2,48,000 पौधों की, 2,81,000 जंतुओं की, 68,000 कवकों की, 26,000 शैवालों की, 4,800 जीवाणुओं की तथा 1,000 विषाणुओं की हैं। पारितंत्रों के क्षय के कारण लगभग 27,000 प्रजातियां प्रतिवर्ष विलुप्त हो रही हैं। इनमें से ज्यादातर ऊष्णकटिबंधीय छोटे जीव हैं। अगर जैव विविधता क्षरण की वर्तमान दर कायम रही तो विश्व की एक चौथाई प्रजातियों का अस्तित्व सन 2050 तक समाप्त हो जाएगा। 

जैव-भूगोलविदों ने भारत को विशेषता, जलवायु, मिट्टी और जैव विविधता के साथ प्रत्येक क्षेत्र को दस जैव-भौगोलिक क्षेत्रों में वर्गीकृत किया है। अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आई.यू.सी.एन.) के अनुसार भारत में पौधों की लगभग 45,000 प्रजातियां पाई जाती हैं, जो दुनिया की कुल आबादी का लगभग 7 प्रतिशत भाग है। पौधों की लगभग 1,336 प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है। भारत में लगभग 15,000 फूलों की प्रजातियां पाई जाती हैं, जो दुनिया की कुल आबादी का लगभग 6 प्रतिशत भाग है। इनमें से लगभग 1,500 फूलों की प्रजातियां लुप्तप्राय हैं। भारत में 91,000 पशुओं की प्रजातियां पाई जाती हैं, जो दुनिया की कुल आबादी का लगभग 6.5 प्रतिशत भाग है। 

एक-दूसरे पर निर्भर हैं पशु-पक्षी व वनस्पति
जैव विविधता को बनाए रखने के लिए हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम अपनी धरती की पर्यावरण संबंधित स्थिति के तालमेल को बनाए रखें। जैव विविधता के महत्वपूर्ण होने के पीछे तर्क है कि यह पारिस्थितिकीय प्रणाली के संतुलन को बना कर रखती है। विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षी तथा वनस्पति एक-दूसरे की जरूरतें पूरी करते हैं और साथ ही ये एक-दूसरे  पर निर्भर भी हैं। उदाहरण के तौर पर हम अपनी मूलभूत आवश्यकता जैसे खाने, रहने के लिए भी अन्य प्रजातियों पर आश्रित हैं। जैव विविधता की समृद्धि ही पृथ्वी को रहने के लिए तथा जीवनयापन के लायक बनाती है। दुर्भाग्य से बढ़ता हुआ प्रदूषण हमारे वातावरण पर गलत प्रभाव डाल रहा है। 

पिछली कुछ शताब्दियों में कई वनस्पति एवं जानवरों की प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं और आने वाले समय में कई लुप्त होने की कगार पर हैं। यह जैव विविधता के लिए खतरे का संकेत है। मनुष्य को चाहिए कि वह इस संकट को गंभीरता से ले और वातावरण को शुद्ध बनाने का संकल्प ले। साफ-सुथरा वातावरण ही समृद्ध जैव विविधता को बढ़ावा दे सकता है जिससे मानव जाति को अपना जीवनयापन करने में किसी तरह की दिक्कत का सामना न करना पड़ेे। सबसे पहले इंसान को जैव विविधता के महत्व को समझना होगा। सड़कों पर दौड़ते बड़े-बड़े वाहन बड़े पैमाने पर प्रदूषण फैला रहे हैं जो मनुष्य जाति के लिए बहुत बड़ा खतरा है। 

वातावरण की शुद्धता को बचाने के लिए इन वाहनों पर अंकुश लगाना होगा ताकि ये वातावरण को और दूषित न कर पाएं। फैक्टरियों से निकलता दूषित पानी जल-जीवन को खराब कर रहा है। पानी में रहने वाले जीवों की जान पर संकट पैदा हो गया है। इस निकलते दूषित पानी का जल्दी से जल्दी उचित प्रबंध करना होगा ताकि यह बड़ी आपदा का रूप न ले ले। इसी तरह से ध्वनि प्रदूषण पर भी लगाम लगानी होगी। वनों की कटाई भी एक बहुत बड़ी वजह है जैव विविधता में होती गिरावट की। इससे न सिर्फ पेड़ों की संख्या घटती जा रही है बल्कि कई जानवरों एवं पक्षियों से उनका आशियाना भी छिनता जा रहा है जो उनके जीवन निर्वाह में एक बड़ी मुसीबत बन चुका है। वातावरण की दुर्गति को देखते हुए इस पर तुरंत प्रभाव से नियंत्रण पाना होगा। 

जैव विविधता का संरक्षण
जैव विविधता संरक्षण की मुख्यत: दो विधियां होती हैं जिन्हें यथास्थल संरक्षण तथा बहि:स्थल संरक्षण के नाम से जाना जाता है। यथास्थल संरक्षण-इस विधि के अंतर्गत प्रजाति का संरक्षण उसके प्राकृतिक आवास तथा मानव द्वारा निर्मित पारितंत्र में किया जाता है जहां वह पाई जाती है। सुरक्षित क्षेत्रों में राष्ट्रीय पार्क, अभयारण्य तथा जैव मंडल रिजर्व आदि प्रमुख हैं। राष्ट्रीय पार्क की स्थापना का मुख्य उद्देश्य वन जीवन को संरक्षण प्रदान करना होता है जबकि अभयारण्य की स्थापना का उद्देश्य किसी विशेष वन्य जीव की प्रजाति को संरक्षण प्रदान करना होता है। जैव मंडल रिजर्व बहुउपयोगी संरक्षित क्षेत्र होता है जिसमें आनुवांशिक विविधता को उसके प्रतिनिधि पारितंत्र में वन्य जीवन जनसंख्या, आदिवासियों की पारम्परिक जीवन शैली आदि को सुरक्षा प्रदान कर संरक्षित किया जाता है।

बहि:स्थल संरक्षण-यह संरक्षण की वह विधि है जिसमें प्रजातियों का संरक्षण उनके प्राकृतिक आवास के बाहर जैसे वानस्पतिक वाटिकाओं, जंतुशालाओं, आनुवांशिक संसाधन केन्द्रों, संवद्र्धन संग्रह आदि स्थानों पर किया जाता है। इस विधि द्वारा पौधों का संरक्षण सुगमता से किया जा सकता है। इस विधि में बीज बैंक, वानस्पतिक वाटिका, ऊतक संवद्र्धन तथा आनुवांशिक अभियांत्रिकी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत सरकार द्वारा वन्य-जीवों के संरक्षण के लिए कई परियोजनाएं चलाई गई हैं जैसे कि कस्तूरी मृग परियोजना 1970, प्रोजैक्ट हुंगल 1970, गिर सिंह परियोजना 1972, बाघ परियोजना 1973, कछुआ संरक्षण परियोजना 1975, गैंडा परियोजना 1987, हाथी परियोजना 1992, गिद्ध संरक्षण प्रोजैक्ट 2006, हिम तेंदुआ परियोजना 2009 आदि। 

जैव विविधता मुख्यत: आवास विनाश, पर्यावरण प्रदूषण, विदेशी मूल की वनस्पतियों के आक्रमण, अतिशोषण, वन्य-जीवों का शिकार, वन विनाश, बीमारी आदि के कारण खतरे में है। अत: पारिस्थितिकी संतुलन, मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति एवं  प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, सूखा, भू-स्खलन आदि) से मुक्ति के लिए जैव विविधता का संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।-डा. बी.एस. भल्ला
 

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