लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र: इस भीड़ को नहीं है कानून का डर

नेशनल डेस्क (मनीष शर्मा): कभी गौरक्षा ,कभी बच्चा चोरी तो कभी प्रेम संबंध के नाम पर अनजान चेहरों से भरी भाड़ी गाहे-ब-गाहे हिंसा पर उतारू हो रही है। बिहार के भोजपुर जिले में कल एक युवक की हत्या में शामिल होने के सिर्फ शक होने के आधार पर हिंसक भीड़ ने एक महिला के कपड़े फाड़ दिए और उसे निर्वस्त्र करके घुमाया। बाद में इस हिंसक भीड़ ने कई दुकानों में आग भी लगा दी और पास गुज़र रही ट्रैन पर पथराव भी किया। इस मामले में जुड़े 15 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है।  घटना के बाद 8 पुलिस कर्मियों के सस्पेंड कर दिया गया है।

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मॉब लिंचिंग की हाल की घटनाएं 

  • 15 अगस्त 2018: असम के गुवाहाटी में मवेशी चोरी के शक पर देबेन राजबोंगशी की पीट पीट कर हत्या और तीन घायल।
  • 10 अगस्त 2018: यूपी के बीजापुर में कपिल त्यागी को चोर समझ कर मार डाला।
  • 31 जुलाई 2018: राजस्थान के जोधपुर में अवैध सम्बन्ध के शक पर रामपाल को गांववालों ने मार डाला।
  • 20 जुलाई 2018: राजस्थान के अलवर में अकबर खान को मवेशी चोर समझ कर मार डाला ।

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    भीड़ को मानो कानून का खौफ रत्ती भर भी नहीं है या यूं कहिए कानून से ऊपर हो गए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे देश में भीड़ पर कार्रवाई करने का कोई कानून नहीं है। 17 जुलाई 2018 को मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगाई । तुषार गांधी और तहसीन पूनावाला की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चन्द्रचूड़ की बेंच ने कहा:

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लोकतंत्र की जगह भीड़तंत्र नहीं ले सकता।

  • दोषियों को सजा देने के लिहाज से संसद नया कानून बनाए।
  • कोई भी कानून हाथ में नहीं ले सकता चाहे वो भीड़ क्यों न हो।
  • मॉब लिंचिंग को एक अलग अपराध की श्रेणी में रखा जाए।
  • राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखना, भीड़ द्वारा हिंसा रोकना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।

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सुप्रीम कोर्ट ने जारी की गाइडलाइन्सः

  • लिंचिंग की घटना होने पर तुरंत फिर हो
  • जल्द जांच और चार्जशीट हो
  • छह महीने में मुकदमे का ट्रायल हो
  • अपराधियों को फांसी की सज़ा हो
  • लापरवाह पुलिसकर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई हो
  • पीड़ितों को एक महीने के भीतर मुआवज़े दिया जाए


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राज्य सरकारें गंभीर नहीं
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस जारी हुए एक महीने से ज़्यादा वक़्त हो गया है लेकिन सिर्फ पंजाब,महाराष्ट्र और चंडीगढ़ ने ही इसकी पालना की है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती को राज्य सरकारों ने गंभीरता से नहीं ले रही है। अभी भी मॉब लिंचिंग की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। यह भीड़तंत्र पुलिस भी है जो किसी को भी पकड़ लेती और अपने आप में एक अदालत भी जो सीधे सीधे मौत की सजा सुना देती है। पीछे रह जाते हैं रोते बिलखते पीड़ित के परिवार के लोग।

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