नजरिया: वाजपेयी के बाद अब क्या होगा BJP का रास्ता?

नेशनल डेस्क (संजीव शर्मा): भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के देहावसान के बाद बीजेपी के सामने खुद को फिर से खड़ा करने की चुनौती है।  हालांकि सत्ता में बैठे नेताओं और उनके समर्थकों को यह बात अटपटी सी लग सकती है। लेकिन यही शाश्वत सत्य है कि बीजेपी का भविष्य बहुत कुछ इस बात पर निर्भरर करता है की वो अब क्या लाइन लेती है। भले ही वाजपेयी जी बीमारी के कारण लम्बे अरसे से सियासत में सक्रिय  नहीं थे, लेकिन इसके बावजूद  बीजेपी पर उनके पितृत्व का साया तो था ही। अब जब वो साया उठ गया है तो निश्चित तौर पर देश की सियासी जमात की नजरें बीजेपी के अगले कदम पर हैं। खासकर तब जब कुछ ही माह बाद आम चुनाव संभावित है।  



वाजपेयी जी बीजेपी के संस्थापक अध्यक्ष थे। 1980 में बीजेपी बनने से लेकर अब तक के सफर में बीजेपी वाजपेयी की नीतियों से पूरी तरह प्रभावित और संचलित रही है। बीच में आडवाणी, जोशी, उमा आदि ने एक अलग दायरा कायम करने की कोशिश की लेकिन वे सब सहायक नदियां ही साबित हुईं जो अंतत: अटल समंदर में जाकर लोप होती गईं। यहां तक कि अटल जी को स्मृतिलोप की बीमारी होने के बावजूद उनकी थ्योरी के अनुसार ही बीजेपी चली। यह वाजपेयी ही थे जिन्होंने 13 दिन, 13 माह के बाद फिर से 13 दलों को एकसाथ लेकर  सरकार बनाई और सफलता पूर्वक पांच साल चलाई। यह जहां उनके हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा। वाले लेखन को चरित्रार्थ करता था वहीं  सबको साथ लेकर चलने की उनकी क्षमताओं का भी उदाहरण था। आज जब लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के अपने घटक  दलों में  बेचैनी मची हुई है। आज जब बीजेपी की सीटें कम होने की चर्चा है। आज जब बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। तो इस सबके साये में यह जरूरी हो जाता है कि बीजेपी वाजपेयी को पहले से ज्यादा पकड़ कर रखे।  



कश्मीर पर हमेशा प्रासांगिक 
जम्मू कश्मीर में ताजा ताजा सियासी तलाक के बावजूद तमाम नेता और कश्मीरी वाजपेयी को  उनकी कश्मीरियत-जम्हूरियत और इंसानियत वाली सोच के लिए सलाम कर रहे हैं। बिना शक मोदी शाह को इस सोच को न सिर्फ जिन्दा रखना होगा बल्कि उभारकर आगे बढ़ाना होगा। अगर ऐसा होता है तो भविष्य में भी कश्मीर में बीजेपी असर बरकरार रहेगा जो आगे चलकर उसी के काम आएगा। उधर शिवसेना और अकाली दल जैसे सहयोगी तो एनडीए में बने ही इसलिए हुए थे कि वे बीजेपी से कम और वाजपेयी से ज्यादा बंधे थे। वे नहीं चाहते थे कि वाजपेयी के समय में  बाँधा गया बंधन टूटे इसलिए तमाम दिक्कतों या शिकायतों के बावजूद वे बने रहे. लेकिन अब अगर जरा सी भी लापरवाही हुई तो ये दोस्त अलग राह चल सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे ममता बनर्जी ने अलग राह चुनी और अब वे बीजेपी का सरदर्द बनी हुई हैं।  

सबका साथ.... तभी विकास 
अटल जी की एक और खासियत थी. वे कभी मनमानी नहीं करते थे। सबकी बात  सुनते थे फिर बहुमत तय करके फैसला सुनाते थे। ये अलग बात है कि उनका फैसला अंतिम माना जाता था। जबकि इसके विपरीत वर्तमान नेतृत्व पर मनमानी के आरोप जब -तब लगते रहे हैं। बीजेपी के भीतर से ही कई 'शत्रु ' 'आजाद ' होकर बोलने लगे हैं।  ऐसे में मौजूदा सरमायेदारों को अटल जी की उस बात को भी आत्मसात करना होगा। सबका साथ ही बीजेपी का विकास करा पाएगा।  

 विदेश नीति पर निगाहें 
अटल जी विदेश नीति के माहिर माने जाते थे। आलम यह था कि उनके विपक्ष में रहते भी नेहरू जी तक विदेशी मामलों पर उनकी सलाह लेते थे।  नरसिम्हा राव ने उनको संयुक्त राष्ट्र में भेजा था भारत का पक्ष रखने के लिए। उनके तमाम राष्ट्राध्यक्षों और स्टेट्समैन से सियासत से इतर दोस्ताना सम्बन्ध थे।  उनकी इस खासियत को मोदी काफी हद तक  अपनाये हुए हैं। हालांकि उनके इन प्रयासों को सियासी चश्मे से देखा जाता है। इसके लिए मोदी को अपने ऐसे संबंधों में  नेचुरल नेचर डालना होगा ताकि किसी को यह न लगे की इसके पीछे भी सियासत ही है।  

Related Stories:

RELATED भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने अटल बिहारी वाजपेयी को दी श्रद्धांजलि