जब अटल जी ने दिया अपने दोस्त को 4 हजार करोड़ का तोहफा

नेशनल डेस्क (संजीव शर्मा): यूं तो सच्ची दोस्ती खुद में ही अनमोल होती है, लेकिन कभी कभी दोस्तों के दिए कुछ तोहफे ऐसे भी होते हैं जो इतिहास बन जाते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी अपने दोस्त को ऐसा तोहफा दिया था जो अब मिसाल बन गया है। बनता भी क्यों नहीं, आखिर ये तोहफा मामूली भी तो नहीं था। यह तोहफा हजार दो हजार का नहीं पूरे चार हजार करोड़ का था। जी हां ये किस्सा नहीं हकीकत है। ये उन दिनों की बात है जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। गर्मी की छुट्टियां बिताने वे मनाली के प्रीणी गांव में अपने घर पहुंचे थे।  वाजपेयी जब भी यहां आते उन्हें एक ख़ास शख्स के आने का इंतजार रहता। उस शख्श का नाम था टशी दावा जो रोहतांग दर्रे के उस पार लाहौल स्पीति के ठोलंग गांव में रहता था। दोनों ने 1942 में बड़ोदरा में आरएसएस के विशेष प्रशिक्षण शिविर से ओटीसी सेकेण्ड ईयर किया था। वैचारिक दोस्ती इस कदर परवान चढ़ी कि कालांतर में जब अटल जी प्रधानमंत्री बने तो दोनों की दोस्ती को कृष्ण-सुदामा की दोस्ती की संज्ञा से भी  सम्बोधित किया गया। यह उस दौर की दोस्ती ही थी कि अटल जी को मनाली प्रवास में खास तौर पर टशी के आने का इंतजार रहता। 
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टशी दावा के बेटे राम देव कपूर उस दौर को याद करते हुए बताते हैं की कई बार जब पिता जी (टशी  दावा) अटल जी से मिलने जाते तो अटल जी कहते  आओ टशी , मैं तो कल से रोहतान के उतुंग शिखरों को देख रहा था के कहीं मेरा मित्र दर्रा पार करते वक्त दिख जाए। ऐसी दोस्ती थी दोनों की।  ऐसी ही एक मुलाकात 2002 में भी हुई जो मिसाल का रूप ले गयी। टशी बीमार थे और उन्होंने संदेश भेज रखा था कि अबके  प्रीणी नहीं आ पाएंगे। अटल जी ने भी संदेश भिजवाया कि मैं तो मनाली में बसा ही तुम्हारे लिए हूं टशी और दोस्ती की यही तहरीर बीमारी के बावजूद  टशी  को प्रीणी  खींच लायी। पंजाब केसरी का यह संवाददाता उस समय वहीं मौजूद था। मिलते ही टशी  के मुंह से निकला अटल अब मैं बूढा हो गया हूं।
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रोहतांग की ऊंचाई पर मेरा सांस रुकता है। अब शायद  दोबारा न आ पाऊं '।पल भर के लिए अटल जी खामोश रहे फिर अपने चिर-परिचित अंदाज में बोले - तुम फिक्र मत करो टशी अब मैं प्रधानमंत्री हूं, तुम्हारे लिए  रोहतांग के नीचे सुरंग बनवा  दूंगा। दोनों ठहाका लगाकर हँसे थे । हालांकि अटल जी ने तब यह मजाक में ही कहा था। लेकिन आगे चलकर यही मजाक जब हकीकत के धरातल पर उतरा तो  इसने वर्तमान की रोहतांग सुरंग का रूप ले लिया। उस वक्त हिमाचल के तत्कालीन सी एम प्रेम कुमार धूमल ने अटल जी की यह बात पकड़ ली। 
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धूमल सांसद के तौर पर मनाली के रास्ते लेह के लिए रेल लाइन की पैरवी करते रही थे। लिहाजा उन्होंने इसे तुरंत भांप लिया कि यह सुरंग समूची लाहौल घाटी की तकदीर बदलने  वाली परियोजना बन सकती है। सर्दी के मौसम में लाहौल घाटी छह महीने के लिए शेष विश्व से कट जाती थी। ऐसे में हजारों लोग राम भरोसे जीने को मजबूर हो जाते थे, क्योंकि इस दौरान रोहतांग लांघ कर मनाली पहुंचना संभव नहीं होता। अटल जी के वापस दिल्ली पहुंचने के साथ ही रोहतांग सुरंग की फाइल भी उनके टेबल पर हिमाचल सरकार ने पहुंचा दी थी। जाहिर है फाइल ओके होनी ही थी। इस तरह रोहतांग सुरंग का मामला आगे बढ़ा। बाद में यूपीए सरकार के दौरान 28 जून 2010  को इसके काम का  बाकयदा शुभारम्भ हुआ। करीब नौ किलोमीटर लम्बी यह सुरंग अब लगभग बनकर तैयार है और इसे अगले साल आम जनता के लिए खोल दिया जायेगा। इसपर कुल 4000 करोड़ खर्च हुआ है।
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हालांकि अब इस सुरंग से गुजरने के लिए टशी  दावा मौजूद नहीं हैं। उनका 2007 में देहांत हो गया था। अटल जी भी जब से स्मृतिभृंश की बीमारी से घिरे हैं तबसे मनाली नहीं गए।  लेकिन बिना शक दोनों की दोस्ती की यह मिसाल , रोहतांग सुरंग , जब आम जनता के लिए खुलेगी तो  उस  मुकद्द्स दोस्ती की खुशबू लाहौल वादी में खुशियों और तरक्की की एक नई इबारत लिखेगी, क्योंकि तब कोई जीवन की उम्मीद में रोहतांग लांघते हुए दम नहीं तोड़ेगा।    
 

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