नज़रिया: 71 का देश, 70 का रुपया और बचकाना नेतृत्व

नेशनल डेस्क (संजीव शर्मा): जब से होश संभाला है स्वाधीनता दिवस के मौके पर एक गाना जरूर हर मंच से सुना है।  -- हम लाए हैं तूफां से कश्ती निकाल के, इस देश को मेरे बच्चों रखना संभाल के। जब मैं बच्चा था तो बड़ा खुश होता था कि देश मुझे देश संभालने को कहा जा रहा है। पता नहीं किसी अनदेखी जिम्मेदारी का भाव कहां से आ जाता था और मैं इतराता फिरता था। हालांकि तब इसके मायने मालूम नहीं थे। लेकिन आज जाकर पता चल रहा है कि गाने के बोल ऐसे क्यों थे। गौर से देखिये देश संभालने वाले बच्चे ही तो हैं। 



बच्चों के हवाले है यह देश 
एक गंदे नाले की गैस से सीधे पाइप खींचकर चाय बनाने की कहानी सुना कर मेक इन इंडिया आगे बढ़ाने को कह रहा है तो दूसरा मशीन में एक तरफ आलू डालकर सोना निकालने के दिवास्वप्न देख रहा है। यानी सच में यह देश बच्चों के हवाले है। और इसी बचकाने नेतृत्व के चलते आज भारत की हालत यह है कि जो देश कभी विश्व गुरु था उसे विदेशी जीने, प्रशासन, खेल आदि के गुर सिखा रहे हैं। आप खंगाल लीजिये हर क्षेत्र में विदेशी गुरु मिल जायेगा। फिर चाहे वो  गणितीय संललन हों या कबड्डी। विदेशी ही सिखा रहे हैं कैसे और क्या करना है। जिस नेतृत्व को यह नहीं पता कि तक्षशिला कहां है, जिसे यह नहीं पता की BHEL मोबाइल फोन बनाती है या कुछ और वो देश को कहां और कैसे ले  जाएगा यह सोचने वाली बात है। आज रूपया डालर के मुकाबले 70 के सबसे निचले स्थान पर लुढ़क गया है।  


रुपये ने नहीं झेली थी इतनी गिरावट
आज़ादी के बाद इतनी गिरावट रुपये ने नहीं झेली। जब देश आज़ाद हुआ तब एक डालर और रूपया बराबरी पर थे। आज 70 रुपये का एक डालर है। आज 32 करोड़ का देश इकहत्तर साल में 130 करोड़ का हो गया और उसी अनुपात में हमारी समस्याएं भी बढ़ती गयीं। वर्तमान में तो 30 करोड़ लोग रोज भूखे सोते हैं। हां इस दौरान देश के कर्णधारों की सम्पत्तियों में 600 गुना की बढ़ोतरी हुई है जो कम आश्चर्यजनक नहीं है। संख्या 12 से बढ़कर 29 हो गयी है और अभी भी चार नए राज्यों की मांग जोरों पर है। अगर इससे विकास होता तो ठीक था लेकिन वास्तविकता यह है कि राज्यों का गठन भी नेताओं के लिए नयी कुर्सियां मुहैया कराने तक सीमित होकर रह गया है। 


देश में दोहरा नेतृत्व
स्वाधीनता दिवस पर हमारे देश में देशभक्ति की भावनाएं हिलोरे ले रही होती हैं। हम अपने शहीदों को याद करते हैं। लेकिन क्या यह काम दिलचस्प नहीं कि जो नेता कल तक शहीदों के नाम की कविता वांचते थे, पाकिस्तान को आतंक का पोषक बनाकर टीवी कार्यक्रम में वाहवाही लूटते थे वही आज इमरान खान से दोस्ती की दुहाई देकर उसके शपथ ग्रहण समारोह में जाने के लिए इजाजत मांग रहे हैं। ऐसे दोहरे नेतृत्व का क्या किया जाये..? क्या यह सच में देश संभालने  लायक हैं..? अगर कल छुट्टी पर रहेंगे तो फुर्सत के लम्हों में इसे विचारियेगा जरूर। जय हिन्द।  
 

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