उस दिन चीख-पुकार से दहल उठा था झाबुआ, हर तरफ थे लाशों के ढेर... पसरा था मातम

झाबुआ: तीन साल बीत चुके हैं, लेकिन झाबुआ के धरती आज भी चीख-पुकार से दहल उठती है। 12 सितंबर 2015 का वो दिन जब किसी ने अपना बेटा खोया, किसी ने भाई, किसी ने पति तो किसी के सिर से बाप का साया ही उठ गया। उस हादसे में 79 लोगों की जान गई थी और करीब 150 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। घायलों में भी कितनों कि जान गई होगी ये किसी को नहीं पता। यूं समझिए कि उस हादसे के मंज़र को याद कर लोग आज सहम उठते हैं।

दरअसल हम बात कर रहे हैं पेटलावट ब्लास्टकी। त्रासदी की आज तीसरी बरसी है। इसी ब्लास्ट में पेटलावद ब्लास्ट के मुख्य आरोपी राजेन्द्र कासवां के मारे जाने की पुष्टि भी डीएनए रिपोर्ट से हो चुकी है। हालांकि उसकी मौत पर अब भी सवाल खड़े होते हैं।
 



क्या हुआ था उस दिन ?
हादसे वाले दिन पेटलावाद में सबकी जिंदगी रोज की तरह दौड़ रही थी। किसको क्या पता था कि कुछ ही पलों में क्या होने वाला है। ये हादसा पेटलावद के नया बस स्टैंड इलाके में हुआ था। हर रोज कि तरह सुबह साढ़े आठ बजे तक तो जिंदगी सामान्य थी। लेकिन इसी बीच यहां जोरदार धमाका हुआ और पलक झपकते ही हर तरफ लाशों का ढेर लग गए, हर जगह धूल का गुब्बार था, दिन के उजाले में भी सब अंधेरा महसूस करने लगे, लाशों के शिवा कुछ भी दिख नहीं रहा था।



कैसे हुआ ब्लास्ट ?
दरअसल पेटलावद इलाके में राजेन्द्र कासवां नाम के शख्स की खाद-बीज की दुकान थी। लेकिन, उसने यहां अवैध रूप से जिलेटिन रॉड और ईडी का गोदाम बना रखा था। सुबह करीब 8.30 बजे पहला धमाका हुआ। दुकान के भीतर से धुआं निकलने लगा। बस स्टैंड इलाका और पास में एक रेस्टोरेंट होने की वजह से उस वक्त काफी भीड़ थी। धमाका और धुआं देखकर इसके बारे में जानने के लिए लोग घटनास्थल के नजदीक पहुंच गए। बस उसी दौरान दूसरा धमाका हुआ जिसने अगले ही सैकेंड लाशों के ढेर लगा दिया।



हादसे में 79 लोगों की मौत और 150 से ज्यादा घायल
हादसे के बाद यहां कोई भी खड़ा नहीं दिखा। कोई मर गया तो कोई घायल होकर तड़प रहा था। आधिकारिक तौर पर तो हादसे में करीब 79 लोगों की मौत की और 150 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। लेकिन उन घायलों में भी आगे कितने जिंदा रहे ये भी पता नहीं है।



आरोपी भी ब्लास्ट में मारा गया!
कहते हैं कि 'जो दूसरों के लिए खड्डा खोदता है, पहले वहीं उसमें गिरता है'। ऐसा ही इस ब्लास्ट के मुख्य आरोपी के साथ भी हुआ। ब्लास्ट के बाद आरोपी राजेन्द्र कासवा के जिंदा होने या मारे जाने को लेकर करीब तीन महीने तक सस्पेंस बना रहा। उसकी तलाश में जगह-जगह पोस्टर लगाए गए। लेकिन, दिसंबर में तमाम अटकलों पर विराम लग गया, जब डीएनए रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हुई कि राजेन्द्र कासवां भी इसी ब्लास्ट में मारा गया। लेकिन आज भी कुछ लोगों का कहना है कि सरकार झूठ बोल रही है जबकि राजेन्द्र कासवा जिंदा है और उन्होंने मामले में सीबीआई जांच की मांग की है।



बस स्टैंड का नाम बदलकर रखा गया है 'श्रद्धाजंलि चौक'
हर साल 12 सितंबर आती है और अपनों की चीख-पुकार लोगों के कानों गूंजना शुरू हो जाती है। अब उस हादसे की याद में नया बस स्टैंड का नाम ही श्रद्धाजंलि चौक कर दिया गया है। यहां लोग आज भी आकर मृतकों को श्रद्धांजलि देते हैं। यहां तक कि कई आदिवासी तो इस स्थान पर आकर धूप-ध्यान भी कर जाते हैं। वार-त्योहार अपनों की याद में कई तरह के आयोजन इस चौक पर हो रहे हैं।

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