1971 से भी बदतर हालात: 6 महीने में पाक ने गांवों पर 300 गोले बरसाए

Tuesday, February 13, 2018 11:38 PM
1971 से भी बदतर हालात: 6 महीने में पाक ने गांवों पर 300 गोले बरसाए

जालंधर: जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के साथ लगती अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर दुश्मन की तरफ से लगातार गोलीबारी जारी है। 1971 के युद्ध के बाद अब हो रही गोलीबारी से हालात बदतर हुए हैं। भारत-पाक सीमा पर बसे लोगों का कहना है कि विभाजन के बाद से ही सीमा पार से गोलीबारी होती आ रही है। 

अंतर्राष्ट्रीय सीमा के साथ सटे सुचेतगढ़ और साथ लगते गांवों बदरी गुलाबगढ़, अब्दाल, कपूरपुर और कुशालपुर, जो कि सियालकोट से 11 किलोमीटर और लाहौर से 141 किलोमीटर दूरी पर हैं, के लोगों ने दावा किया है कि अब वे ‘नए टार्गेट’ बन गए हैं। समका और शाहबाद टंकन वाली के 2 छोटे गांवों के लोगों ने आरोप लगाया कि अब वे सीमापार की गोलीबारी के निशाने पर हैं। जम्मू से 30 किलोमीटर दूर स्थित लगभग एक दर्जन गांवों के लोग कृषि करते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ दिनों से उन्हें नियमित रूप से जगह खाली करनी पड़ रही है। सीमा पर कभी भी शांति नहीं हुई। अगस्त, 2017 के बाद से दुश्मन की गोलीबारी ने हमारे मकानों को भी निशाना बनाया है। 

1971 में 2 गोले फैंके गए
सीमा पर बसे लोगों का कहना है कि 1971 में यहां केवल 2 गोले फैंके गए थे जबकि अगस्त, 2017 के बाद से पाकिस्तान द्वारा 170 परिवारों को निशाना बनाया गया और करीब 300 गोले फैंके गए। हर मकान को निशाना बनाया गया है। शाहबाद टंकन वाली के सरपंच सेवानिवृत्त फौजी स्वर्ण सिंह का कहना है कि अब हालात 1971 से बदतर हो गए हैं। मकान का दरवाजा भी खटकता है तो बच्चे पूछते हैं कि क्या यह सीमापार से होने वाली गोलीबारी की आवाज है।

उन्होंने कहा कि अब उनके भविष्य को खतरा पैदा हो गया है। बच्चों के लिए बनी क्रिकेट की पिच पर गोले आ गिरते हैं। अधिकांश मकानों की दीवारों पर गोलियों के निशान बने हुए हैं और बाहरी चौकियों पर पाकिस्तानी झंडे फहराते दिखाई दे रहे हैं। बीना देवी ने बताया कि अधिकांश घरों में शौचालय बने हुए हैं जबकि कुछ जगहों पर शौच के लिए खेतों में जाना पड़ता है। दोनों जगह ही खतरे में हैं। 

उन्होंने कहा कि 24 जनवरी को भारी गोलाबारी हुई। रात 9 बजे जब मैंने रोटी के लिए पहला पेड़ा बनाया तो गोला फैंके जाने की आवाज सुनाई दी थी। उस रात हम बिना कुछ खाए-पिए सोए। सुबह तक गोले बरस रहे थे। एक गोला हमारे बाथरूम की छत पर आ गिरा। सारिका सोना ने बताया कि नवम्बर, 2003 के सीजफायर के बाद से स्थितियां बदल गई हैं। अब पाकिस्तान का कोई भरोसा नहीं है। सोना ने बताया कि मेरी शादी 2004 में हुई तो मैं इस गांव में आई। 2006 में मैंने पहली बार गोले गिरते देखे। सेना ने हमारे गांव को खाली करवा लिया और हमें दूसरी जगह कैम्प में शिफ्ट कर दिया गया।

कोई अलर्ट नहीं
सोना ने बताया कि 18 जनवरी को संभावित गोलाबारी के बारे में अलर्ट नहीं जारी किया गया। उन्होंने बताया कि शाम 6 बजे गोलाबारी शुरू हुई जो कि अगली सुबह तक जारी रही। हमारे घर निशाना बने। खिड़कियों के शीशे तक टूट गए। यही नहीं, टैरेस पर रेलिंग भी टूट गई। बलविन्द्र सिंह ने बताया कि यह पहली बार है कि नवांशहर की ओर हमारी तरफ से 3-4 किलोमीटर तक गोलीबारी हुई। उन्होंने कहा कि यह मूड पर निर्भर करता है कि किस दिन गोली चलानी है और कितने गोले बरसाने हैं। कभी-कभार हमें कुछ दिन के लिए सभी गांव खाली करने की सूचना दी जाती है। कई बार ऐसी सूचना नहीं भी दी जाती है। 

गणतंत्र दिवस से पहले 24 जनवरी को हमें शांति से रहने के लिए छोड़ा गया, जब दुश्मनों ने राजौरी की तरफ तोपों का मुख किया। साथ ही बलविन्द्र सिंह ने बी.एस.एफ. कैम्प से कुछ दूरी पर सुचेतगढ़ की तरफ कंटीली तारों के आगे पाकिस्तान के लहरा रहे झंडे की तरफ भी इशारा किया। सुचेतगढ़ का रहने वाला दविन्द्र सिंह गोलीबारी में जख्मी अपने एक मवेशी को मलहम लगा रहा था, ने बताया कि 19 जनवरी को उनके घर के परिसर में 81 एम.एम. का गोला आकर गिर गया जिससे वह घायल हो गए। उन्हें इलाज के लिए जम्मू के मैडीकल कालेज ले जाया गया। उनकी बाजू टूट जाने के कारण उन्हें प्लस्तर लगाया गया है।   


 



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