अटार्नी जनरल ने जो कहा, वह काफी है : रामलाल

Sunday, January 14, 2018 8:35 AM
अटार्नी जनरल ने जो कहा, वह काफी है : रामलाल

नेशनल डेस्कः भारतीय जनता पार्टी दो स्तर पर काम कर रही है। एक तरफ केंद्र में सरकार और दूसरी तरफ पार्टी का आधार बढ़ाने की चुनौती। दोनों कडिय़ों को जोडऩे का काम पार्टी के केंद्रीय संगठन महामंत्री रामलाल के जिम्मे है। संघ से हमेशा जुड़े रहे रामलाल पार्टी में भी अपनी भूमिका को राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ मिलकर बेहतर तरीके से अंजाम दे रहे हैं।

पेश है पंजाब केसरी/नवोदय टाइम्स से उनकी विशेष बातचीत:

भाजपा जिस तरह बढ़ रही है, उस यात्रा को किस तरह से देखते हैं?
ये सब केंन्द्र और राज्य की भाजपा सरकारों की लोककल्याणकारी योजनाओं और कार्यकर्त्ताओं की मेहनत की सफलता का नतीजा है। मोदी जी के नेतृत्व में प्रदेश में भी सुशासन व कल्याणकारी योजना को लेकर कार्य हो रहा है।  हमारे कार्यकर्त्ता जितनी मेहनत कर रहे हैं, उसका परिणाम तो मिलेगा ही।

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आखिर कौन सी योजनाएं हैं, जो गेम चेंजर हैं?
कई योजनाएं महत्वपूर्ण होती हैं। सबसे पहली बात तो यह कि देश के प्रधानमंत्री के बारे में जनता में एक धारणा बनी। भारत का सम्मान भी दुनिया में निरंतर बढ़ा है। चाहे देश में रहने वाले हों या फिर विदेश में रहने वाले, सभी अनुभव करते हैं। विशेष रूप से  देश की सुरक्षा पर प्रतिबद्धता,सीमा की सुरक्षा, जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के सफाए और पूर्वोत्तर में लगातार स्थिति सुधरी है। गरीब, देश के अन्य वर्ग व समाज को यह विश्वास है कि प्रधानमंत्री मोदी देश को ऊंचाई पर ले जा रहे हैं। सामान्य धारणा बनी है कि प्रधानमंत्री विकास, सुशासन और देश के लिए दिन-रात जीते हैं। केंद्रीय योजनाओं पर विचार करेंगे तो जन-धन खाते से शुरूआत कर सकते हैं। 30 करोड़ खाते खुलवाना साधारण बात नहीं है। सुरक्षा बीमा योजना से लोगों में कम पैसे के बावजूद जीवन सुरक्षा के प्रति एहसास बढ़ा। कई अन्य विभागों को जोड़कर स्किल डिवैल्पमैंट बनाया, उसके परिणाम भी आने शुरू हुए हैं। फिर उसके बाद मुद्रा योजना का बड़ा प्रभाव दिखा। सरकार ने हर बैंक शाखा को निर्देश दिया कि वह दो लोगों को  एस.सी.-एस.टी. लोन देने का काम करें। समाज के इस वर्ग को लगा कि कोई हमारे लिए भी इस तरह से सोच रहा है।  जिस तरह से भाजपा सरकार में क्रमबद्ध होकर व्यापक तरीके से सोचा गया, इससे पूर्व किसी सरकार ने यह तरीका नहीं अपनाया। अगर किसानों की बात करें तो सोयल हैल्थ कार्ड भी बेहतर योजना है। इसमें मिट्टी की जांच कराकर कम खर्च में किसान अधिक उपज प्राप्त कर सकता है और उसकी आय दोगुनी हो, यह नीति भी क्रम से जल्द ही जमीन पर दिखेगी।


आखिर किसानों की आत्महत्याएं  क्यों रुक नहीं रहीं?
सरकार उनकी आय दोगुनी करना चाहती है। आय साल भर में नहीं बल्कि क्रम से होती है। खेती में लागत कम और उपज अधिक और उसका ठीक मूल्य समय पर मिल रहा है। जिन प्रांतों ने तीनों चीजें की, वहां किसान में खुशहाली दिखाई देती है। फसल बीमा योजना को लेकर कुछ राज्यों को लगता है कि कहीं इसका श्रेय प्रधानमंत्री को न मिल जाए। इसमें प्रदेश का भी अंश होता है। मुझे लगता है कि क्रम से उन चीजों में बढ़ौतरी होगी। प्रदेशों के हालात अलग-अलग हैं। कहीं धान ज्यादा है कहीं कपास अधिक है। दक्षिण में मसाले अधिक होते हैं। फसल बीमा योजना को प्रधानमंत्री ने क्रमबद्ध व्यापक बनाया है। हमारी प्राथमिकता में गरीब, मजदूर, किसान की आॢथक दृष्टि सुदृढ़ करने पर जोर है। अंत्योदय की दिशा में ही यह सरकार भी सकारात्मक तरीके से बढ़ रही है।


सुप्रीम कोर्ट में जजों के विवाद पर क्या कहना है?
न्यायालय के प्रति देश में एक अलग सम्मान का भाव है, वह सुरक्षित बना रहना चाहिए। मूल बात यह है कि उसके सम्मान के प्रति सभी के व्यवहार में भी ऐसा दिखे, यह भी जरूरी है। हम सब को इस बात का ध्यान रखना चाहिए।
 

जजों का प्रैस कांफैं्रस करना कितना उचित?
मुझे लगता है कि अटार्नी जनरल ने इस पर जो बयान दिया है, वह काफी है। उस भावना से सब लोग काम करेंगे तो बेहतर है।


कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बहरीन में सरकार के खिलाफ बातें कहीं, उस पर आपकी टिप्पणी।
विदेश नीति के विषय में पहले से ही स्पष्ट है, इसमें सत्ता-विपक्ष की बात नहीं है। प्रधानमंत्री या अन्य कोई मंत्री अथवा वरिष्ठ नेता विदेश जाते हैं तो नीतिगत बोलते हैं। विपक्ष के नेता को भी देश की राजनीति पर विदेश में बात नहीं करना चाहिए, यह परंपरा बनी हुई है। इसका निर्वाह करना चाहिए।


तमाम दिक्कतों के बाद गुजरात की जीत को किस तरह से देखते हैं?
हर चुनाव को हम परिश्रमपूर्वक लड़ते हैं। सभी राज्यों में बराबर मेहनत की जाती है। अध्यक्ष स्वयं बैठते हैं, पदाधिकारियों में भी बातचीत होती है। जहां तक बात गुजरात में जिग्नेश और दलित राजनीति  की है,मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान में यह स्थायी रूप से अधिक सफल नहीं होती। जिन दलों ने भी ऐसा किया, वे सभी कुछ प्रांत से आगे नहीं बढ़ पाए। कांग्रेस ने गुजरात में जिग्नेश या ऐसे लोगों अथवा जातिवादी राजनीति से अपने को क्यों जोड़ा, यह वही जानते होंगे। सीट कम रहना अलग बात है। भाजपा सुशासन, विकास पर लड़ती है। तभी 22 वर्ष से लगातार गुजरात में है और इस बार भी 49 फीसदी वोट लाना बड़ी बात है। सीटों में कम-ज्यादा होना अलग बात है, लेकिन कांग्रेस हमेशा से ही 40 प्रतिशत के आसपास रही है। भाजपा 46-50 प्रतिशत पाती रही है। हमारा वोट प्रतिशत इस बार भी बढ़ा है।


दलित राजनीति पर भाजपा की क्या भूमिका होगी?
भाजपा जातिवादी राजनीति कभी नहीं करती। भाजपा सबका साथ, सबका विकास पर कायम है। अटल जी के समय एन.डी.ए. की पहली सरकार में भी इसी नीति पर काम किया गया था। दलितों के इलाकों में भी विकास के कार्य हुए। सभी की प्रगति होनी चाहिए,  हम इस पर काम करते रहे हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ जाकर देखा तो वहां प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत जिस गुणवत्ता के साथ मकानों का निर्माण हुआ है, उसका लाभ सभी वर्गों को मिला। उज्ज्वला योजना ने लोगों का जीवन बदला है, यह उन लोगों की बात सुनने के बाद एहसास हुआ। हम दलितों के लिए हमेशा रहे हैं और साथ रहेंगे।


मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ चुनाव में विरोधी दलों का किस तरह से मुकाबला करेंगे?
जहां भी शासन होता है उसके विरोध में विपक्ष भी कई तरह की बातों को उठाता है और अपनी बातों को रखता है। हिमाचल में उनकी कमियों को उजागर करने की हमने कोशिश की। हम इस कार्य को सफलतापूर्वक कर पाए। हम अपनी बात को जनता तक पहुंचाने और समझाने में सफल रहे। विपक्ष तो सरकार के विरोध में बातें करेंगे। हमारी सरकार विकास के मुद्दे पर लड़ती है और लड़ेगी।


कर्नाटक में सी.एम. सिद्धरमैया भी उसी पिच पर काम कर रहे हैं, जिस पर भाजपा खेलती रही है, अब क्या?
जनता बुद्धिमान है। पांच साल सरकार कैसे चली, यह भी प्रश्न होगा। तीन माह में पिच बदलने से अथवा चुङ्क्षनदा मुद्दे से कुछ नहीं होगा, समाज समझ जाएगा कि तोडऩे वाले मुद्दे हैं। अलग-अलग कारणों से साढ़े चार साल कुछ न करें और आखिर में कुछ ऐसे मुद्दे निकालें, उससे कुछ नहीं होगा। विकास के मामले में तुलना करेंगे तो भाजपा ही दिखाई देगी।
 

भाजपा का आरोप है कि विपक्ष विघटनकारी तत्वों को बढ़ा रहे हैं, कैसे?
मेरा काम संगठन के संबंध में है, ऐसे विषयों पर टिप्पणी करना सही नहीं है। लेकिन जिस प्रकार से जे.एन.यू. में नारे लगे ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं और देश के टुकड़े होंगे’ उस तरह के तत्व और उनके साथ खड़े होने वाले लोगों को देश का राष्ट्रवादी मन, देश और देशवासी कभी स्वीकार नहीं करेंगे। विघटनकारी वायदे और ऐसे तत्वों को कौन स्वीकार करेगा।
 

क्या आपको लगता है कि जीएसटी और नोटबंदी के झटके से देश उबर चुका है?
कोई भी बड़ा अथवा महत्वपूर्ण निर्णय इच्छाशक्ति के बूते लिया जाता है। इंदिरा जी के समय में भी नोटबंदी का विषय आया था, उन्होंने तब उसे अगले चुनाव से जोड़कर  देखा था और फैसला टाल दिया,लेकिन मोदी जी ने देश के अर्थतंत्र को सुदृढ़ करने के लिए निर्णय किया। उन्होंने यह निर्णय करते समय इसे वोट की राजनीति से नहीं जोड़ा। उसके बाद भी हम चुनाव जीते। उन नीतियों पर जनता ने मुहर लगाई है।  जीएसटी का विरोध सूरत में सबसे ज्यादा बताया गया था, लेकिन वहां 16 में से 15 सीटें आईं। सरकार की नीयत साफ दिख रही है। असहमति के साथ चर्चा होनी चाहिए और होती भी है। जीएसटी में भी ऐसा ही हो रहा है। अब सभी निर्णय सर्वसम्मति से हो रहे हैं। ट्रांसपोर्टरों की कुछ डिमांड हो सकती है, लेकिन पहले उनको कितना समय लगता था और अब कितना समय लगता है। सभी के नतीजे जोड़ेंगे तो लाभ हो रहा है। कुछ और सुझाव आए हैं, उन पर वित्त मंत्री ने जीएसटी काऊंसिल में कहा है कि विचार करेंगे।


भारतीय राजनीति नए दौर में है। 19 राज्यों में भाजपा सरकार है। भाजपा ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के बारे में कहती रही है। आखिर पार्टी चाहती क्या है?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का जो नारा दिया है, उसका अर्थ राष्ट्र को एकजुट, मजबूत करना है। ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ नारे का अर्थ है कि कांग्रेस की उन दूषित नीतियों को समाप्त करना, जो देश के लिए अनुकूल नहीं है। शब्दार्थ में जाएंगे तो अलग-अलग अर्थ लग सकते हैं। ऐसी नीतियों से देश पिछड़ जाएगा। वैसे भी कोई भी पार्टी खत्म नहीं होती।


जम्मू-कश्मीर को लेकर भाजपा की क्या नीति हैै? सीमा पार से हमले लगातार जारी हैं। पाकिस्तान के साथ किस तरह से पेश आना चाहिए?
शासन की नीति स्पष्ट है। आतंकवाद तबाही का रास्ता है। इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं। जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को पोषित करेगा, आतंकी आते रहेंगे, संबंध मधुर नहीं हो सकते। एक तरफ  आतंक को पोषित करें और दूसरी तरफ सब होता रहे, यह नहीं हो सकता है। आतंकवाद पर जीरो टोलरैंस नीति है। हम तो मान जाएं, लेकिन सामने वाला नहीं माने तो फिर मुकाबला करना पड़़ेगा।  सेना का मनोबल सरकार हमेशा बढ़ाती रही है। सेना को फ्री हैंड भी है। हां, कुछ मामलों में सेना को जमीन पर ही निर्णय करने होते हैं। अलगाववाद को समाप्त करने के लिए हम जो भी होगा, करेंगे। अलगाववादियों को सोचना पड़ेगा कि पाकिस्तान से मदद हासिल  कर कुछ भी करेंगे, तो देश स्वीकार नहीं करेगा।


2019 के चुनाव को भाजपा संगठन किस तरह से देख रहा है?
जैसे परिणाम आए हैं, उसी तरह 2019 के चुनाव में सकारात्मक परिणाम आएंगे। हम हर चुनाव शिद्दत से लड़ते हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में काम करते हंै। सभी मानते हैं वह कुशल रणनीतिकार हैं। उचित समय पर जो रणनीति बनाना आवश्यक है,वह उसे बनाएंगे। हिमाचल, गुजरात में आपने देखा कि बूथ स्तर, पन्ना प्रमुख तक पर मेहनत हो रही थी। प्रधानमंत्री का नेतृत्व और राष्ट्रीय अध्यक्ष का नीति और नीचे तक जाकर कार्यकत्र्ताओं का जो मेल बनता है, उससे वह लोगों के मन की स्थिति को समझते हैं और लोगों को भी उन पर विश्वास है।
 

वाजपेयी और मोदी सरकार में क्या अंतर मानते हैं?
दोनों नेताओं में तुलना करना उपयुक्त नहीं है। गठबंधन पहले भी था और अब भी है। लेकिन स्वाभाविक रूप से पूर्ण बहुमत की सरकार में कुछ अंतर होता है। पूर्ण बहुमत का मनोवैज्ञानिक परिणाम भी होता है। इसका फायदा हमें मिला। निर्णय लेने में अलग मजबूती होती है। वैसे हर नेता की अपनी शैली होती है। साढ़े तीन वर्ष में पूर्ण बहुमत का असर दुनिया में भी मोदी सरकार को लेकर दिख रहा है। विदेश में भारत सरकार के प्रति यह विश्वास भी नजर आया है कि जो भी नीति बनेगी, वह लंबे समय तक के लिए होगी।



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