मोदी के म्यांमार दौरे से क्यों तिलमिलाया चीन ?

Wednesday, September 6, 2017 11:35 AM
मोदी के म्यांमार दौरे से क्यों तिलमिलाया चीन ?

बीजिंगः ब्रिक्स सम्मेलन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सीधे म्यांमार दौरे से चीन की टैंशन बढ़ गई है।16 अगस्त 2017 को  चीन के सरकारी अखबार ने भारत और म्यांमार के बीच बढ़ती नजदीकी पर गहरी चिंता जाहिर की थी। हालांकि फिलहाल  चीन ने इस पर चुप्पी साध रखी है और उसकी ओर से इस बाबत कोई विरोधी प्रतिक्रिया नहीं आई है। चीनी अखबार ने चिंता जताई थी किभारत अपनी एक्ट ईस्ट पॉलिसी के जरिए म्यांमार में चीन के प्रभाव को कम करना चाहता है। 
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भारत और म्यांमार के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 2.2 अरब डॉलर व  चीन और म्यामांर के बीच द्विपक्षीय व्यापार कुल 9.5 अरब डॉलर का है। साल 2016-2017 में ही दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 6 अरब डॉलर का रहा है।इसके अलावा रक्षा के क्षेत्र में भी म्यांमार और चीन एक-दूसरे के बेहद करीब हैं।इससे साफ है कि म्यांमार भारत की बजाय चीन के ज्यादा करीब है। हालांकि भारत और म्यांमार के बीच 1,642 किमी की सीमा है ।इसके अलावा बंगाल की खाड़ी में भी दोनों देशों की समुद्री सीमाएं मिलती हैं। इतिहास भी गवाह कि म्यांमार भारत के मुकाबले चीन के ज्यादा करीब रहा है। 

माना जा रहा था कि म्यांमार में चीन ने मजबूत पैठ बना ली है, लिहाजा वहां भारत को पैर जमा पाना मुश्किल है, लेकिन मोदी  ने  म्यांमार की अहमियत समझी और उसको रक्षा सहयोग का प्रस्ताव दिया जिससे चीन तिलमिला गया और चीनी अखबार ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। चीन ने कहा कि भारत ने म्यांमार में चीन को मात देने के लिए यह प्रस्ताव दिया है। पूर्ववर्ती भारत की सरकारों का म्यांमार के प्रति रूखा रवैया रहा है, जिसका फायदा उठाकर चीन ने म्यांमार में अपना प्रभुत्व स्थापित किया। हालांकिमोदी के सत्ता में आने के बाद दोनों देशों के बीच रिश्ते की नई शुरुआत होने लगी।
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 मोदी ने म्यांमार को भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का अहम पिलर करार दिया। इस एक्ट ईस्ट पॉलिसी का मकसद दक्षिण पूर्व आसियान देशों के साथ भारत के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करना है। म्यांमार एक ऐसा आसियान देश हैं, जिसकी जमीनी सीमा भारत से मिलती है,लिहाजा म्यांमार को भारत का गेटवे टू आसियान कहा जाता है। आंग सान सू  के सत्ता में आने के बाद भारत और म्यांमार के बीच रिश्ते बेहदतर होने की उम्मीद बढ़ी। इसकी वजह है सू की शिक्षा भारत में ही हुई व उनको भारत समर्थक माना जाता है।हालांकि सत्ता में आने के बाद सू की ने भी भारत से पहले चीन का दौरा किया था।

 




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