ग्रह स्वयं बोलते हैं, जरूरत है उनकी भाषा को समझने की

Saturday, June 10, 2017 2:33 PM
ग्रह स्वयं बोलते हैं, जरूरत है उनकी भाषा को समझने की

कोई भी ज्योतिषी, तान्त्रिक, साधु, संन्यासी आपका भाग्य नहीं बदल सकता। ज्योतिष से मात्र भविष्य में क्या होने वाला है? इसका भान समय से पहले हो जाता है एवं व्यक्ति समय से पहले सावधान होकर उस समस्या का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहता है एवं देव कृपा प्राप्त कर होने वाले प्रभाव को कुछ कम कर सकता है। ज्योतिषी भविष्यवाणी नहीं करता अपितु ग्रह स्वयं बोलते हैं। यह अलग बात है कि कौन कितनी उनकी भाषा समझते हैं। जहां सूर्य में तेज ओज-प्रकाश और जलाने का गुण है वहीं नेतृत्व शक्ति का परिचायक है। जहां चंद्रमा में शीतलता है, प्रकाश है, वहीं चलायमान मनोवृत्ति भी है। मंगल है ही संहारक, युद्ध-लड़ाई, कोर्ट-कचहरी का परिचायक तो बुध है। युवराज-परमुखापेक्षी सदैव सूर्य का आश्रय ढूंढता है।


गुरु देवराज गरिमामय उपदेशक पठन-पाठन, विद्या  द्योतक है तो चरित्र देने में सहायक भी हैं। ईमानदार है तो जनमानस के लिए कल्याणकारी भी है। शुक्र है ही कामदेवरूप शृंगार-भोग, ऐश्वर्य-आनंद का सागर, तो शनि न्यायाधीश बनकर वाचालता रहित न्यायप्रिय-कठोर है। राहू-केतु क्रमश: शनि-मंगल की छाया रूप हैं।


ग्रह अपना गुण धर्म नहीं छोड़ते। कर्म फल देकर ही रहेंगे। पाप करके आनंद चाहो, भोग लिप्त रहकर मोक्ष की कामना करो, आलसी बन ऐश्वर्य चाहो, कुसंगति कर न्याय चाहो, अहित कर हित की मनोकामना भला ग्रह कैसे करने देंगे? बोए पेड़ बबूल का आम कहां से खाए।


पाप ग्रहों से घिरकर भाव बचा रहे, यह संभव नहीं, इसी को ज्योतिष में पाप ‘कर्तरी योग’ कहा है। सप्तम भाव के दोनों ओर पाप ग्रह अर्थात सूर्य-मंगल-शनि-राहू-केतु में से कोई हो और गृहस्थ सुख पा जाए, यह तो संभव नहीं और अष्टम-दशम में पाप ग्रह होकर महाभाग्यवान घर में जन्म लेकर भी जातक को दुर्भाग्यशाली बना दे तो आश्चर्य क्या?


‘दीपक तले अंधेरा’ दीपक-लालटेन-टार्च लेकर चलने वाला दूसरों को प्रकाश के घेरे में ले लेगा पर स्वयं के पांव तो अंधेरे में ही पड़ेंगे, इसी कारण कहा है ‘स्थान हानि करो जीव’ पंचम भाव में अकेले गुरु अन्य ग्रहों से दृष्ट न होकर पुत्र दे दे तो आश्चर्य ही होगा और लाभस्थ होकर धनोपार्जन करवा दे तो आश्चर्य! इसी कारण आचार्यों ने कहा ‘कारको भाव नाशाय’। सूर्य जलाए बिना कैसे रहे, जलाना, तपाना उनका गुण-धर्म है, मंगल कांट-छांट करेगा ही, यदि पंचम भाव पर उसकी दृष्टि हो और गर्भ क्षति न हो यह कैसे संभव है? शनि दंडाधिकारी है फलत: गलत को दंड देना, ईमानदार की रक्षा करना उसका स्वभाव है। शनै:श्चर है फलत: सुफल देगा पर धीरे-धीरे परन्तु स्थायी, पर मनुष्य है कि तत्काल फल की कामना करता है और जल्दी फल चखने की आकांक्षा में गलत-सही का भान नहीं करता और दंड पाता है, चाहे मानसिक-आर्थिक-भौतिक या दैहिक।


चंद्रमा तो है ही चलायमान, अस्थिर मन की चाल और इनकी चाल में कोई अंतर नहीं। चंद्रमा मनसो जात: कहा है। जहां भी विराजमान हुए उसी को अस्थिर बना दिया। दो ही तो तत्व प्रधान हैं- जल और अग्रि। भ्रांति है ज्योतिषियों में जिन ग्रहों की पूजा-अर्चना करते हैं, यज्ञ-हवन में हविष्य में ग्रहण करते हैं, दान दिया जाता है, जप-तप, पूजा होती है, वे ग्रह भी भला ‘नीच’ के होते हैं? तब फिर क्या ऋषियों-महर्षियों ने गलत कहा है? नहीं, दोष हमारी समझ का है।


जब अग्रि, जल से संबंध जोड़ती है तो अग्रि प्रभावहीन हो जाती है। इसी भाव को ‘नीच’ का संकेत दिया और लगी आग में पैट्रोल छिड़क दो, आग और भी भड़क उठेगी। इसी को ‘उच्च’ का संकेत नाम दिया। सूर्य अग्रि कारक जब मंगल राशि मेष (अग्रि) से संबंध जोड़ेगा तो उच्च व तुला (जल) से संबंध जोड़ेगा तो नीच का कहा गया अर्थात लगी आग पर पानी पड़ा तो आग ठंडी हो गई।


बारह भाव उनका क्रम और इसी को लेकर आए दिन शंकाएं होती हैं पर व्यर्थ! कभी देखा है! समझा है! लग्र यदि पुरुष है तो सप्तम भाव स्त्री। दो ही तो लिंग हैं पति और पत्नी में अंतर क्या है, मात्र लिंग भेद ही तो है, बारहों लग्र में देखें, सप्तम भाव लिंग भेद है।


छठा भाव रोग शत्रु है तो होगा क्या? नाश ही। चाहे धन का, मन का या देह का और तभी देखें छठे का सातवां भाव नाश है। चतुर्थ भाव माता का है तो स्वत: लिंग भेदानुसार दशम भाव का पिता है। एक व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी या लाभ क्या है? सुयोग्य संतान का होना जो बुढ़ापे का सहारा बने, बूढ़े की लाठी और पंचम का सप्तम लाभ ही तो है। भाग्यशाली कौन है? उत्तर है जिसकी बांह मजबूत हो अर्थात भाई। भाग्य का सप्तम भाव भाई है, वही उसका पराक्रम है।


आप मानेंगे कि ग्रह स्वयं बोलते हैं, जरूरत है उनकी भाषा को समझने की। जरूरी है गहरा चिंतन-मनन। जरूरी है ग्रहों की चाल, उनका रंग-रूप, उनका स्वरूप, उनका प्रभावित क्षेत्र जानना।



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