गुरुपर्व आज: ये हैं भारत के प्रसिद्ध गुरुद्वारे, सभी समान आस्था से टेकते हैं माथा

Saturday, November 4, 2017 11:42 AM
गुरुपर्व आज: ये हैं भारत के प्रसिद्ध गुरुद्वारे, सभी समान आस्था से टेकते हैं माथा


आज का दिन सिखों के लिए खास महत्व रखता है। इस दिन को सिखों के प्रथम गुरू नानक देव जी के प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है। गुरु नानक देवजी का प्रकाश उत्सव (जन्म)15 अप्रैल, 1469 ई. (वैशाख सुदी 3, संवत्‌ 1526 विक्रमी) में तलवंडी राय भोई नामक स्थान पर हुआ, जिसे अब ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है। इनके अनुयायी इन्हें गुरु नानक, गुरु नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं। गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्म सुधारक, समाज सुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु सभी के गुण समेटे हुए थे। सुविधा की दृष्टि से गुरु नानक का प्रकाश उत्सव कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन को सिख धर्म के अनुयायी गुरु पर्व के रूप में मनाते हैं। आज के इस खास दिन जानतें हैं कुछ एेसे गुरूद्वारे के बारे में जो बेहद सुंदर और प्रसिद्ध हैं। 

 

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1.गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब सिंह (पंजाब)
श्री हरमंदिर साहिब जिसे दरबार साहिब या स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है, सिख धर्मावलंबियों का पवित्र धार्मिक स्थल का सबसे प्रमुख गुरुद्वारा है। यह भारत के राज्य पंजाब के अमृतसर शहर में स्थित, यहां का सबसे बड़ा आकर्षण है। यह गुरुद्वारा सुंदर होने के साथ-साथ विश्वभर में प्रसिद्ध और भारत के मुख्य दार्शनिक स्थलों दिन में भी शामिल है। इस गुरुद्वारे का बाहरी हिस्सा सोने का बना हुआ है, इसलिए इसे स्वर्ण मंदिर अथवा गोल्डन टैंपल के नाम से भी जाना जाता है।  

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2.गुरुद्वारा श्री हेमकुंट साहिब (उत्तराखंड)
श्री हेमकुंट साहिब भारत में स्थित सिखों के प्रमुख तीर्थ स्थानों में से एक है। यहां हिमालय में 4632 मीटर की ऊंचाई पर एक बर्फीली झील के किनारे सात पहाड़ों के बीच श्री हेमकुंट साहिब गुरुद्वारा सुशोभित है। इस स्थल तक पहुंचने के लिए ऋषिकेश-बद्रीनाथ के रास्ते से गुजरते हुए गोबिन्दघाट से पैदल चढ़ाई की जाती है। इस स्थान का उल्लेख गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित दशम ग्रंथ में पाया गया, इस कारण यह उन लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है जे लोग दशम ग्रंथ में विश्वास रखते हैं। मान्यता है कि यहां पहले एक मंदिर विराजित था, जिसका निर्माण भगवान राम के अनुज लक्ष्मण ने करवाया, पश्चात दसवें गुरु गोबिन्द सिंह ने यहां पूजा अर्चना की और इसे गुरूद्वारा घोषित कर दिया। 

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3.हजूर साहिब गुरुद्वारा (महाराष्ट्र)
हजूर साहिब सिख धर्म के पांच तख्तों में से एक, जो श्री हजूर साहिब, तख्त सचखण्ड श्री अबचलनगर साहिब से देश भर में प्रचलित है। ये पश्चिमी भारत के प्रसिद्ध के महाराष्ट्र के राज्य के नांदेड़ में मौजूद गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। इस संरचना का निर्माण गुरू गोबिंद साहिब की मृत्यु के स्थान पर किया गया था, गुरूद्वारे के भीतरी कक्ष को अंगीठा साहिब कहा जाता है, जिसका निर्माण उस स्थान पर किया गया जहां से 1708 में गुरू गोबिंद साहिब का दाह संसकार हुआ था। 

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4.गुरुद्वारा पोंटा साहिब (हिमाचल प्रदेश)
पोंटा साहिब, भारतीय राज्य हिमाचल प्रदेश में अवस्थित है। यह सिरमौर जिल्ले के उत्तर दिशा मे जमुना नदी के किनारे, जहां गुरू गोबिंद सिंह ने अपने जीवन के 4 वर्ष बिताए और इसी जगह पर दशम ग्रन्थ की रचना की। गुरुद्वारे का एक संग्रहालय है, जो गुरु के उपयोग की कलम और अपने समय के हथियारों को दर्शाती है। जमुना नदी के किनारे  "पोंटा साहिब" का ये गुरुद्वारा सिख संप्रदाय के लिए बहुत बड़ा तीर्थ स्थल माना जाता है।

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5.सीस गंज गुरुद्वारा (दिल्ली)
गुरुद्वारा शीश गंज साहिब दिल्ली में मौजूद 9 ऐतिहासिक गुरुद्वारों में से एक है। गुरुद्वारा शीश गंज साहिब पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक में स्थित, जिसका 1783 में बघेल सिंह ने 9वें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर की शहादत के उपलक्ष्य में निर्माण किया था। इसी जगह गुरू तेग बहादुर को मौत की सजा दी गई थी, जब उन्‍होंने मुगल बादशाह औरंगजेब के इस्‍लाम धर्म को अपनाने के प्रस्‍ताव को ठुकरा दिया था। दिल्ली का यह सबसे पुराना और ऐतिहासिक गुरुद्वारा, गुरु तेग बहादुर और उनके अनुयायियों को समर्पित है। यह गुरूद्वारा 1930 में बनाया गया था, इस जगह अभी भी एक ट्रंक रखा है, जिससे गुरू जी को मौत के घाट उतार दिया गया था।

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6. फतेहगढ़ साहिब (पजाब)
फतेहगढ़ साहिब पंजाब के फतेहगढ़ साहिब जिला का मुख्यालय गुरूद्वारा, जो सिक्‍खों की श्रद्धा और विश्‍वास का प्रतीक है। पटियाला के उत्‍तर में स्थित यह स्‍थान ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्‍व रखता है। सिखों के लिए इसका महत्‍व इसलिए भी ज्‍यादा है क्योंकि यहीं पर गुरु गोविंद सिंह के दोनों बेटों को सरहिंद के तत्‍कालीन फौजदार वजीर खान ने दीवार में जिंदा चुनवाया, जिनकी शहादत की याद में इस का निर्माण करवाया गया।

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7. तख्त श्री दमदमा साहिब (पंजाब)
लुधियाना से 23 किमी दूर स्थित गुरुद्वारा दमदमा साहिब भी पर्यटन में खासा महत्व रखता है। दमदमा का मतलब ‘श्वास या आराम स्थान’ होता है। इसे छठे सिख गुरू, गुरू हरगोविंद जी की स्मृति में बनवाया गया था, जो 1705 में यहां कुछ समय के लिए रुके थे। यहां समय बिताने के दौरान गुरू हरगोबिंद जी ने सिंहों के सिख धर्म में आस्था की परीक्षा ली। उन्होंने बाबा डाल का बपतिस्मा भी किया और उसका नाम डाल सिंह रखा। साथ ही शहीद भाई मनी सिंह जी द्वारा रचित आदि गुरू ग्रंथ साहिब को भी स्वीकृति दी। गुरू हरगोविंद जी ने इस स्थान को यह आशीर्वाद दिया कि जो कोई भी यहां पूरी श्रद्धा के साथ आएगा उनकी मनोकामना पूरी होगी।

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8. गुरुद्वारा मणिकरण साहिब (हिमाचल प्रदेश)
मणिकर्ण भारत के हिमाचल प्रदेश राज्य में कुल्लू जिले के भुंतर से उत्तर पश्चिम में पार्वती घाटी में व्यास और पार्वती नदियों के मध्य बसा है, जो हिन्दुओं और सिखों का प्रमुख तीर्थस्थल है। मणिकर्ण में बहुत से मंदिर और एक गुरुद्वारा है। सिखों के धार्मिक स्थलों में इसका विशेष स्थान है। गुरुद्वारा मणिकर्ण साहिब गुरु नानकदेव की यहां की यात्रा की स्मृति में बना था। जन्मसखी और ज्ञानी ज्ञान सिंह द्वारा लिखी तारीख गुरु खालसा में इस बात का उल्लेख है कि गुरु नानक ने भाई मरदाना और पंच प्यारों के साथ यहां की यात्रा की थी। इसीलिए पंजाब से बडी़ संख्या में लोग यहां आते हैं। पूरे वर्ष यहां दिन में 2 समय लंगर सेवा चलती है।

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9.गुरुद्वारा श्री केशगढ़ साहिब (पंजाब)
गुरुद्वारा श्री केशगढ़ साहिब, पंजाब के आनंदपुर शहर में है। कहा जाता है कि आनंदपुर शहर की स्थापना सिखों के 9वें गुरू तेग बहादुर ने की थी। साथ ही यह गुरुद्वारा सिख धर्म के खास 5 तख्तों में से एक है। इसी कारणों से इस गुरुद्वारे को बहुत ही खास माना जाता है।

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10.गुरुद्वारा बंगला साहिब(दिल्ली)
गुरुद्वारा बंगला साहिब दिल्ली के सबसे महत्वपूर्ण गुरुद्वारों में से एक, अपने स्वर्ण मंडित गुम्बद शिखर से एकदम ही पहचान में आ जाता है। यह नई दिल्ली के बाबा खड़गसिंह मार्ग पर गोल मार्किट, नई दिल्ली के निकट स्थित है। बंगला साहिब के रुप में मौजूद जगह पहले राजा जय सिंह की थी, जिसे बाद में गुरु हरकिशन जी की याद में एक गुरुद्वारे में तब्दील कर दिया गया। शुरुआती दिनों में इसे जयसिंहपुरा पैलेस कहा जाता था, जो बाद में बंगला साहिब के नाम से मशहूर हुआ



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