रामायण: मनुष्य योनि में जन्म लेकर ये काम करने वाला होता है पिशाच

Tuesday, June 6, 2017 2:47 PM
रामायण: मनुष्य योनि में जन्म लेकर ये काम करने वाला होता है पिशाच

रामायण में भगवान श्रीराम के जीवन का संपूर्ण वृतांत है। इसमें जीने की कला का जो वर्णन किया गया है, वह जितना प्रासंगिक कल था उतना आज भी है। रामचरितमानस में भगवान शिव और देवी पार्वती का एक प्रसंग है। जिसमें उन्होंने एक चौपाई के माध्यम से कुछ ऐसे बुरे काम बताएं हैं जो राक्षसी प्रवृति के हैं। मनुष्य योनि में जन्म लेकर उन कामों को करने वाला व्यक्ति पिशाच होता है।   

 
चौपाई
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा।।
मानहिं मातु पता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।।
जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।।

 
अर्थात- किसी दूसरे के धन और स्त्री पर नजर रखने वाला, दुष्ट, चोर और जुआरी प्रवृति का, माता-पिता और देवी- देवताओं को मान न देने वाला एवं साधु संतों से अपनी सेवा करवाने वाला मनुष्य राक्षस है।


 
अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी अन्य महिला पर नजर रखने वाले का कभी अच्छा नहीं हो सकता। उसके साथ-साथ उसके कुल का भी पतन निश्चित है। राक्षस राज रावण ने देवी सीता पर नजर डाली और उनका सर्वनाश हो गया।  


 
चोरी और जुआ ऐसे अवगुण हैं जो बिना किसी परिश्रम के हासिल होते हैं। जो वस्तु बिना किसी श्रम के हासिल होती है वो चिरस्थाई नहीं होती। इन अवगुणों से न केवल व्यक्ति का पतन होता है बल्कि परिवार, समाज व राज्य का भी विनाश होता है।


 
दूसरे के धन पर आंख रखने वाला व्यक्ति उस शक्तिशाली राक्षस के समान है जो स्वयं तो मेहनत करता नहीं दूसरों की मेहनत की कमाई को बलपूर्वक छिनकर उसका उपभोग करते हैं। 


 
भगवान एक सर्वव्यापक शक्ति है जो संसार के कण-कण में विद्यमान है। उस शक्ति से ऊपर स्वयं को मानने वाला राक्षसी व्यक्ति अपने अहंकार में चूर होकर गलत काम करता है जो उसके नाश का कारण बनता है।


 
हिंदू धर्म में साधु-संतों को भगवान के समान माना जाता है क्योंकि वो हमें भगवान की लीलाओं का रस्सावदन करवाते हैं। जिससे नास्तिक से नास्तिक व्यक्ति का भी जीवन सफल हो जाता है। जो अधर्मी उनकी कृपा को न जानकर उनसे अपनी सेवा करवाता है वह कभी सुखी नहीं रह सकता।


 
माता-पिता इस धरती पर साक्षात भगवान के समान हैं। उनकी सेवा करने वाले से एवं उनके कहने पर चलने वाला व्यक्ति जीवन में कभी धोखा नहीं खाता। जो बच्चे उनकी इच्छा के विरूद्ध जाते हैं वो राक्षसी संतान कभी सुखी नहीं रह सकती। 


 
दुष्ट लोग दूसरों का बुरा करके बहुत खुश होते हैं केवल राक्षस ही दुसरों को दुखी देखकर खुश होते हैं। ऐसा अवगुण इंसान की फितरत नहीं हो सकती। 



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