नृसिंह जयंती की कथा

Tuesday, May 9, 2017 8:00 AM
नृसिंह जयंती की कथा

पद्मपुराण के अनुसार दिति और ऋषि कश्यप जी के दो पुत्र हिरण्यकश्यप (हिरण्याकशिपु) और हिरण्याक्ष हुए। ये दोनों बड़े बलशाली एवं पराक्रमी  तथा सभी दैत्यों के स्वामी थे। हिरण्याक्ष को अपने बल पर बड़ा अभिमान था क्योंकि उसके शरीर का  कोई निश्चित मापदंड नहीं था। उसने अपनी हजारों भुजाओं से समस्त पर्वत, समुद्र, द्वीप तथा प्राणियों सहित सारी पृथ्वी को उखाड़ कर सिर पर रख लिया तथा रसातल में चला गया जिससे सभी देवता भयभीत होकर त्राहि-त्राहि करते हुए भगवान नारायण की शरण में गए। भगवान ने तब वराह रूप में अवतार लेकर हिरण्याक्ष को कुचल दिया जिससे वह मारा गया तथा भगवान ने धरती को पुन: शेषनाग की पीठ पर स्थापित करके सभी को अभयदान दिया। 


अपने भाई की मृत्यु से दुखी हुए हिरण्यकशिपु ने मेरुपर्वत पर जाकर घोर तपस्या की तथा सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी से वरदान मांगा कि उसे सारी सृष्टि का कोई मनुष्य अथवा पशु मार ही न सके, वह न दिन में मरे तथा न ही रात को, वह न किसी छत के नीचे मरे तथा न ही खुले आकाश में तथा न ही धरती पर मरे, न ही किसी वस्तु पर गिरकर, कोई अस्त्र उसे काट न सके तथा आग उसे जला न सके। यहां तक कि साल के 12 महीनों में से किसी भी महीने में न मर पाए।


ऐसा वरदान पाकर हिरण्यकशिपु स्वयं को अमर मान कर अधिक अहंकार में आ गया और स्वयं को भगवान कहने लगा। दैत्य हिरण्यकशिपु के घर प्रह्लाद का जन्म हुआ। वह बालक भगवान विष्णु के प्रति भक्ति भाव रखता था जो हिरण्यकशिपु को बिल्कुल पसंद नहीं था। उसने अनेकों बार पुत्र को समझाया कि वह भगवान विष्णु की नहीं बल्कि उसकी पूजा करे।  उसने प्रह्लाद को बहुत समझाया परंतु जब वह न माना तो उसने प्रह्लाद को मारने के अनेक असफल प्रयास और अंतत: अंतिम प्रयास के रूप में जब प्रह्लाद के वध का प्रयास किया तो भक्त प्रह्लाद ने नारायण को पुकारा जिस पर ब्रह्मा जी के दिए हुए वचन को पूरा करने के लिए भगवान विष्णु खम्बे में से नृसिंह अवतार  लेकर प्रकट हो गए। वह हिरण्यकशिपु को उठा कर घर की दहलीज पर ले आए। उन्होंने उसे अपनी गोद में लिटा लिया तथा शेर मुख तथा पंजों के नाखूनों से चीर कर उसे मार दिया। उसे दिए वचन को पूरा करते हुए भगवान ने कहा कि ‘इस  समय न दिन है न रात अर्थात संध्या का समय है, न मैं नर हूं न पशु, अर्थात आधा शरीर पशु तथा आधा मनुष्य का है’ तभी उनका नाम नृसिंह पड़ा। 


साल के बारह महीनों में से किसी भी महीने में न मरने का वचन लेने वाले हिरण्यकशिपु को मारने के लिए भगवान ने पुरषोत्तम अर्थात अधिक मास बनाया। भगवान ने नृसिंह अवतार लेकर दुष्ट, पापी एवं अहंकारी हिरण्यकशिपु को मार कर अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। सभी ने मिलकर प्रभु की स्तुति की तथा भगवान ने नृसिंह रूप में ही सभी को आशीर्वाद दिया।   


वीना जोशी
veenajoshi23@gmail.com 



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