शहर का पूरा दूध भी न कर पाया जो काम, लुटिया भर दूध ने दिखाया कमाल

Monday, May 8, 2017 1:45 PM
शहर का पूरा दूध भी न कर पाया जो काम, लुटिया भर दूध ने दिखाया कमाल

शिवभक्त कुमारप्पा को न जाने क्या सूझी कि उन्होंने सोमवार को अपने ईष्टदेव शंकर का हौद दूध से लबालब भर देने के बारे में सोचा। मंदिर का हौद काफी गहरा और चौड़ा था। कुमारप्पा ने प्रधान से मंत्रणा की। प्रधान ने राजा से कहा और राजाज्ञा हुई कि नगर के ग्वाले शहर का पूरा दूध लेकर मंदिर आएं और जो इसका उल्लंघन करेगा वह दंड का भागी होगा।


उस दिन किसी ने घूंट भर भी दूध बछड़ों को नहीं पीने दिया। दूध लाकर हौद में डाल दिया गया पर वह थोड़ा खाली रह गया। राजा को चिंता हुई। इसी बीच एक बूढ़ी आई। भक्ति भाव से उसने लुटिया भर दूध चढ़ाकर भगवान से कहा कि शहर भर के दूध के आगे मेरी लुटिया की क्या बिसात। फिर भी भगवन, बुढिय़ा की श्रद्धा भरी ये दो बूंदें स्वीकार करो। दूध चढ़ाकर बुढिय़ा बाहर निकल आई। 


सभी ने देखा-भगवान का हौद अचानक भर गया। राजा के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। दूसरे सोमवार को फिर वैसा ही हुआ। तीसरे-चौथे सप्ताह भी वही क्रम रहा। राजा का आश्चर्य बढ़ता ही गया। आखिरकार राजा ने स्वयं उपस्थित होकर रहस्य का पता लगाने का निश्चय किया। गांव भर से आया दूध राजा ने अपने सामने हौद में डलवाया पर हौद पूरा नहीं भरा। इसी बीच वृद्धा आई और उसके दूध समर्पित करते ही हौद भर गया। बुढिय़ा पूजा करके निकल गई। राजा भी उसके पीछे हो लिया। कुछ दूर जाने के बाद उसने बुढिय़ा को रोका और पूछा, तुमने कौन-सा जादू कर दिया, जो हौद भर गया? उसने कहा घर के बाल-बच्चों, ग्वाल-बालों सभी को पिलाने के बाद बचे दूध में से एक लुटिया लेकर मैं आती हूं। सभी को तृप्त करके शेष दूध भगवान को चढ़ाते ही वह भाव उसे ग्रहण करते हैं और हौद भर जाता है।



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