निरई माता मंदिर- वर्ष में सिर्फ 5 घंटे होते हैं दर्शन

Saturday, September 2, 2017 1:59 PM
निरई माता मंदिर- वर्ष में सिर्फ 5 घंटे होते हैं दर्शन

देश के अन्य मंदिरों में जहां दिन भर माता रानी के दर्शन होते हैं, वहीं यहां सुबह 4 से 9 बजे तक यानी केवल 5 घंटे ही माता के दर्शन किए जा सकते हैं। केवल 5 घंटे के लिए खुलने वाले मंदिर में दर्शन करने हर साल हजारों लोग पहुंचते हैं।  इस देवी मंदिर की विशेषता यह है कि यहां हर साल चैत्र नवरात्र के दौरान स्वत: ही ज्योति प्रज्वलित होती है। इस दैवीय चमत्कार की वजह से लोग देवी के प्रति अपार श्रद्धा रखते हैं। 


एक प्राचीन मंदिर है निरई माता मंदिर। यह मंदिर छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर स्थित है। जिला मुख्यालय से 12 कि.मी. दूर सोढूल, पैरी नदी के तट पर बसे ग्राम पंचायत मोहेरा के आश्रित ग्राम निरई की पहाड़ी पर विराजमान निरई माता श्रद्धालुओं एवं भक्तों का आकर्षण का केंद्र है। यह मंदिर देवी भक्तों की आस्था का मुख्य केंद्र है। निरई माता मंदिर में सिंदूर, सुहाग, शृंगार, कुमकुम, गुलाल, बंदन नहीं चढ़ाया जाता है। नारियल और अगरबत्ती से माता को मनाया जाता है।


कहा जाता है कि हर चैत्र नवरात्रि के दौरान देवी स्थल पहाडिय़ों में अपने आप से ज्योति प्रज्वलित होती है। ज्योति कैसे प्रज्वलित होती है यह आज तक पहेली बना हुआ है। ग्रामीणों की मानें तो यह निरई देवी का ही चमत्कार है कि बिना तेल के ज्योति नौ दिनों तक जलती रहती है। ग्राम मोहेरा की पहाड़ी में माता निरई की ग्रामीण श्रद्धा-भक्ति से पूजा-अर्चना करते हैं।


माता की भक्ति में लोगों को इतना विश्वास है कि इस पहाड़ी में माता निरई की मूर्ति है न मंदिर, फिर भी लोग श्रद्धा और विश्वास से इसे पूजते हैं। पहाड़ी पर मनोकामना की ज्योति जलाते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि आज से 200 वर्ष पूर्व मोहेरा ग्राम के मालगुजार जयराम गिरि गोस्वामी ने निरई माता की पूजा करने बहुरसिंग धु्रव के पूर्वजों को छह एकड़ जमीन दान में दी थी। जमीन में कृषि कर आमदनी से माता की पूजा-पाठ सम्पन्न हो रही है।


माना जाता है कि निरई माता मनोवांछित फल देने वाली हैं। प्राकृतिक छटा के बीच चारों ओर फैली पर्वत शृंखलाओं व पर्वत की चोटी पर स्थित निरई माता भक्तों को भय एवं दुखों से दूर रखती है। माता की बुराई या शराब सेवन किए हुए व्यक्ति को मधुमक्खियों का कोप भाजन बनना पड़ता है। वर्ष में एक दिन ही माता निरई के दरवाजे आम लोगों के लिए खोले जाते हैं।



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