मथुरा के रंगजी मंदिर में हर तीसरे साल एक माह बाद मनाई जाती है जन्माष्टमी

Monday, August 14, 2017 6:43 PM
मथुरा के रंगजी मंदिर में हर तीसरे साल एक माह बाद मनाई जाती है जन्माष्टमी

वृन्दावन के चार मंदिरों में जन्माष्टमी के दिन वृन्दावन कृष्णमय हो जाता है। रंग जी मंदिर में लगभग हर तीसरे साल एक माह बाद जन्माष्टमी मनाई जाती है।  इन मंदिरों में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 15 अगस्त को मनाई जाएगी, जहां गौड़ीय संप्रदाय के तीन मंदिरों राधारमण, राधा दामोदर एवं शाहजी मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी दिन में मनाई जाती है। रंग जी मंदिर में एक माह बाद जन्माष्टमी मनाई जाएगी। राधारमण मंदिर में तो बालस्वरूप में सेवा होने के कारण गोस्वामी समाज श्रीकृष्ण को दीर्घ आयु होने का आशीर्वाद भी देते हैं। वृन्दावन के प्राचीन राधारमण मंदिर के सेवायत आचार्य दिनेश चन्द्र गोस्वामी ने बताया कि मंदिर में बालस्वरूप में सेवा होती है इसलिए लला को रात में जगाकर उनका जन्म मनाना ठीक नहीं है। उन्होंने बताया कि श्रीकृष्ण का अवतरण तो आज से लगभग सवा पांच हजार वर्ष पहले ही हो गया था इसलिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एक प्रकार से श्रीकृष्ण की सालगिरह है। जिस प्रकार बच्चे की सालगिरह पर उसे अच्छे से अच्छे कपड़े पहनाए जाते हैं तथा अच्छा भोजन और पकवान बनाया जाता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण जन्म पर मंदिर को सजाने और नाना प्रकार के व्यंजन का भोग लगाने की परंपरा सैकड़ों साल से चली आ रही है।


श्री गोस्वामी ने बताया कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन सबसे पहले अभिषेक में भाग लेने वाले गोस्वामी संकीर्तन के मध्य यमुना जल लेकर आते हैं। पट खुलते ही अभिषेक शुरू हो जाता है। सबसे पहले ठाकुर जी का यमुना के जल से अभिषेक किया जाता है। इसके बाद 27 मन दूध, दही, घी, बूरा, शहद, औषधियों, सर्वोषधियों, महौषधियों, फूल फल एवं अष्ट कलश से तीन घंटे से अधिक देर तक घंटे घडियाल एवं शंखध्वनि के मध्य अभिषेक होता है।  उन्होंने बताया कि सबसे अंत में स्वर्ण पात्र में केसर घोलकर ठाकुर जी का उससे अभिषेक किया जाता है। इसके बाद मंदिर के गर्भ गृह पर पर्दा डालकर अंदर ठाकुर का श्रृंगार करते हैं। श्री गोस्वामी ने बताया कि बालस्वरूप में सेवा होने के कारण जब पट पुन: दर्शन के लिए खुलते हैं तो सारे कार्यक्रम उसी प्रकार चलते हैं जैसे लाला का आज ही जन्म हुआ हो। ठाकुर जी को पहले यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। इसके बाद उन्हें माला धारण कराई जाती है। ठाकुर जी को न केवल काजल एवं डिठौना लगाया जाता है बल्कि राई नोन से उनकी नजर उतारते हैं। इसके बाद गेास्वामी वर्ग लाला की दीर्घ आयु के लिए उन्हें आशीर्वाद देता है। उन्होंने बताया कि इस दिन उस पवित्र वस्त्र के भी दर्शन होते हैं जिसे चैतन्य महाप्रभु ने अपने परमप्रिय शिष्य गोपाल भट्ट गोस्वामी को दिया था। इससे डोर और कौपीन कहा जाता है। इसके साथ ही उस पट्टे के भी दर्शन होते हैं जिस पर बैठकर चैतन्य महाप्रभु प्रसाद ग्रहण करते थे। जिसे उन्होंने बाद में गोपाल भट्ट गोस्वामी को दिया था। अभिषेक के बाद ठाकुर जी के उस पोतरा वस्त्र का भक्तों में वितरण होता है। जिसे धारण कराकर ठाकुर जी का पूर्व में अभिषेक किया गया था। जिसे यह प्रसाद मिल जाता है वह बड़ा भाग्यशाली माना जाता है। वृन्दावन के शाह जी मंदिर में इसी प्रकार दिन में जन्माष्टमी मनाते हैं।


मंदिर के महंत शाह कृष्ण शरण गुप्ता ने बताया कि इस मंदिर में भी गौड़ीय परंपरा का निर्वहन होता है। उनका कहना था कि मंदिर में दिन में जन्माष्टमी इसलिए मनाते हैं कि वास्तव में यह श्रीकृष्ण की सालगिरह है। उन्होंने बताया कि मंदिर में ठाकुर का यमुना एवं गंगाजल से अभिषेक कराने के बाद कई मन दूध, दही आदि से पंचामृत अभिषेक किया जाता है। इस अवसर पर चंदन, बीजाष्टक, गुलाबजल, सुमंगली, पंचगव्य, पुष्प, औषधियों, महाऔषधियों आदि से अभिषेक किया जाता है। सबसे अंत में एक किलो केसर से अभिषेक होता है। सप्त देवालयों में मशहूर वृन्दावन के राधा दामोदर मंदिर में भी इसी प्रकार वैदिक मंत्रों के मध्य ठाकुर का न केवल अभिषेक होता है बल्कि उस शिला का विशेष अभिषेक होता है। जिसे श्यामसुन्दर ने सनातन गोस्वामी को यह कह कर दिया था कि यदि वे इसकी चार परिक्रमा कर लेंगे तो उनकी गोवर्धन की एक परिक्रमा हो जाएगी। इस अवसर पर यहां पर भी कई मन दूध, दही आदि अभिषेक सामग्री से मंदिर के महंत कणिका गोस्वामी के सानिध्य में कई घंटे अभिषेक होता है।  कणिका गोस्वामी ने बताया कि इस अवसर पर जीव गोस्वामी के आराध्यदेव राधा दामोदर, कृष्णराजकविराज गोस्वामी के आराध्यदेव राधा वृन्दावनचन्द्र, कवि जयदेव गोस्वामी के आराध्यदेव राधामाधव एवं भूगर्भ गोस्वामी के आराध्यदेव राधा छैल चिकन का भी अभिषेक किया जाता है। यहां के अभिषेक की यह विशेषता है कि ठाकुर के जन्म के बाद एक दूसरे पर हल्दी मिश्रित दही डालकर उसी प्रकार प्रसन्नता व्यक्त की जाती है जैसे लाला का अवतरण उसी दिन हुआ हो। अभिषेक के बाद पर्दे में श्रृंगार होता है तथा श्रृंगार आरती से ही मंदिर के पट बंद हो जाते हैं।  तीनो मंदिरों में ही अभिषेक के बाद लगभग एक घंटे तक चरणामृत का वितरण श्रद्धालु भक्तों में बिना किसी भेदभाव के किया जाता है। वृन्दावनवासी तो इस चरणामृत को ग्रहण करके ही अपने व्रत के नियम की शुरूआत करते हैं।



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