जानें, विश्व भर में कैसे हुई शिक्षक दिवस की शुरूआत

Tuesday, September 5, 2017 10:00 AM
जानें, विश्व भर में कैसे हुई शिक्षक दिवस की शुरूआत

भारत में हर वर्ष 5 सितम्बर को यह दिन मनाया जाता है। स्कूलों व विश्वविद्यालयों में हर कक्षा के छात्र अपनी-अपनी कक्षाओं को खूब सजाते हैं और अपने टीचर के आने पर उनका विभिन्न तरीकों से स्वागत करते हैं। कई तरह के रंगारंग कार्यक्रम व गेम्स आदि आयोजित किए जाते हैं जिनमें टीचर्स को सम्मिलित किया जाता है और उनके प्रति आभार प्रकट करते हुए उन्हें भेंट दी जाती है।


अमेरिका में मई माह के पहले सप्ताह के मंगलवार को टीचर्स-डे  मनाया जाता है। वहां कई तरह के आयोजन किए जाते हैं।


थाईलैंड में यह दिन हर वर्ष 16 जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन यहां सभी स्कूलों में छुट्टी रहती है।


ईरान में प्रो. अयातुल्ला मोर्तेजा मोतेहारी की हत्या के बाद उनकी याद में 2 मई को शिक्षक दिवस मनाने की घोषणा की गई थी।


मलेशिया में 16 मई को मनाए जाने वाले इस महत्वपूर्ण दिन को ‘हरि गुरु’ कहा जाता है।


चीन में 1931 में ‘नैशनल सैंट्रल यूनिवर्सिटी’ में इस दिन की शुरूआत हुई लेकिन बाद में 1939 में ‘कंफ्यूशियस’ के जन्मदिन यानी 27 अगस्त को इसे मनाने की घोषणा की गई। इसके बाद 1951 में फिर से इस घोषणा को वापस ले, 10 सितम्बर,1985 में यह खास दिन घोषित किया गया।


शिक्षक का महत्व : एक शिक्षक अपने विद्यार्थी के साथ कठोर भी होता है और कोमल भी लेकिन उनके दोनों तरह के व्यवहार छात्रों की भलाई के लिए होते हैं। शिक्षक सूर्य के तेज की भांति होते हैं जिनके हमारे जीवन में प्रवेश से हमारे सभी संदेह मिट जाते हैं। प्राचीन समय में गुरुकुलों में गुरुओं के सान्निध्य में शिक्षा ग्रहण की जाती थी। चाहे कोई राजकुमार हो या गरीब, सभी को एक समान शिक्षा व दंड का प्रावधान होता था व सभी शिष्य आश्रम में ही रहते थे। उन्हें गुरुकुल के सभी नियमों का पालन करना पड़ता था। बदलते समय के साथ-साथ गुरु-शिष्य शब्दों की जगह टीचर-स्टूडैंट ने ले ली है लेकिन विद्यार्थी को शिक्षक द्वारा शिक्षा और व्यावहारिक ज्ञान देने का तरीका आज भी वही है। तब भी गुरु पूज्य थे, आज भी शिक्षक पूज्य हैं।


गुरु भक्ति के प्रतीक महापुरुष: ऐसे कई महान पुरुष हुए हैं जो गुरु के प्रति असीम भक्ति और गुरु के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करके उनकी शिक्षाओं को स्वयं व दूसरों के जीवन में उतार कर अमर हो गए। आज भी उन्हें बड़े आदर से याद किया जाता है।


स्वामी विवेकानंद जी का अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस का उनके अंतिम दिनों में गले के कैंसर के कारण थूक, रक्त, कफ आदि बड़े प्रेम से साफ करना। हजरत निजामुद्दीन औलिया के प्रति अमीर खुसरो की गुरु भक्ति, गुरु नानक देव जी के प्रति भाई लहणा जी की भक्ति, छत्रपति शिवाजी की अपने गुरु समर्थ रामदास स्वामी जी के प्रति निष्ठा, एकलव्य का गुरु द्रोणाचार्य के लिए त्याग आदि ऐसे कई उदाहरणों से संसार भरा पड़ा है।
 




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