स्वर्ग की प्राप्ति के लिए इस स्थान का दर्शन-स्पर्श ही काफी है

Tuesday, September 12, 2017 1:40 PM
स्वर्ग की प्राप्ति के लिए इस स्थान का दर्शन-स्पर्श ही काफी है

जनश्रुति है कि ‘गया’ जनपद का नाम ‘गयासुर’ नामक एक दैत्य के नाम पर पड़ा। गयासुर ने गुरु शुक्राचार्य से विद्या ग्रहण करने के पश्चात भगवान विष्णु से अद्भुत वरदान पाने की कामना से उनकी अखंड तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर विष्णु जी ने गयासुर को मनचाहा वरदान दिया :-‘जो भी मनुष्य तुम्हारे दर्शन अथवा तुम्हें स्पर्श मात्र कर लेगा उसे सीधे स्वर्ग की प्राप्ति होगी।’


ऐसा होने से ‘यमपुरी’ में उथल-पुथल मच गई। यमराज के साथ-साथ सभी देवताओं में इसको लेकर चिंता होने लगी? अंतत: यमराज के साथ देवताओं ने भी भगवान विष्णु से अनुनय-विनय की और कहा कि हे प्रभु! आप द्वारा गयासुर को प्रदत्त वरदान से देवलोक में अव्यवस्था फैल गई है, अत: आप इसका शीघ्र ही कोई हल ढूंढने की कृपा करें।


देवताओं की अनुनय-विनय सुनकर भगवान विष्णु ने ब्रह्मा से कहा कि-‘तुम गयासुर के प्राणोत्सर्ग के पश्चात उसके मृत शरीर को पेट के बल लिटाकर उसके सिर को उत्तर एवं पैरों को दक्षिण दिशा में रख कर तथा उसकी पीठ पर बैठकर एक यज्ञ करो।’


और विष्णु जी स्वयं गयासुर के पास जाकर उसे प्राणोत्सर्ग के लिए प्रेरित करने लगे। भगवान विष्णु के आदेश का अक्षरश: पालन करते हुए ब्रह्मा एवं अन्य देवगणों ने गयासुर की पीठ पर बैठकर यज्ञ प्रारंभ किया। ऐसा करने से गयासुर के मृत शरीर के सिर में कम्पन होने लगा जिसे देख देवताओं ने मिलकर एक विशाल धर्मशिला उसके सिर पर स्थापित कर दी फिर भी सिर में कम्पन होना बंद नहीं हुआ जिससे घबराकर देवताओं ने भगवान विष्णु से उक्त घटना को बताया।


भगवान विष्णु के बताने पर सभी देवगण उस विस्थापित धर्मशिला पर खड़े हुए तभी भगवान विष्णु ने अपनी गदा से उस धर्मशिला पर जोरदार प्रहार करने की योजना बनाई।


उक्त योजना का पूर्वानुमान करते हुए गयासुर ने विष्णु जी से प्रार्थना की कि हे प्रभु! आप मुझ पर गदा-प्रहार करने से पूर्व एक वरदान और दें कि-‘जिस शिला पर आप प्रहार करेंगे उस पर आपके पैरों के चिन्ह अंकित हों, सभी देवताओं का इस शिला पर वास रहे और यदि इस शिला पर आकर कोई मनुष्य अपने पितरों का श्राद्ध, पिंडदान एवं तर्पण करे तो उसके पितृों के साथ उस मनुष्य को भी मृत्योपरांत स्वर्ग की प्राप्ति हो।’ 


अंतत: भगवान विष्णु ने गयासुर को मनचाहा वरदान प्रदत्त कर घोषणा की कि-‘आज से यह पवित्र क्षेत्र तुम्हारे नाम ‘गया’ से पुकारा जाएगा। यहां पर जो भी मनुष्य श्राद्ध, पिंडदान व तर्पण करेगा उसके पितृों की प्रेतयोनि और नरकलोक से मुक्ति होकर सीधे स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी और साथ ही साथ कर्मकांड करने वाले को भी मरणोपरांत स्वर्ग की प्राप्ति होगी।’ 


इतना कहने के साथ-साथ भगवान विष्णु द्वारा इस शिला पर एक जोरदार गदा का प्रहार किया गया।


विष्णु जी द्वारा गयासुर को प्रदत्त उसी वरदान के प्रभाव से आज तक गया क्षेत्र में दाह-संस्कार, श्राद्ध, पिंडदान व तर्पण आदि कर्मकांडों को करने की एक पौराणिक महत्ता के फलस्वरूप मनुष्य तो मनुष्य, स्वयं भगवान के मानवरूपी अवतारों- धर्मराज  युधिष्ठिर, भीष्म पितामह, बलराम, श्रीकृष्ण एवं श्रीराम द्वारा भी इसी ‘गया’ में अपने-अपने पितरों का पिंडदान किया गया है।



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