गिरी हुई आत्माएं ही संसार में कष्ट भोगती हैं

Monday, October 30, 2017 2:54 PM
गिरी हुई आत्माएं ही संसार में कष्ट भोगती हैं

अपनी बहन इलाइजा के साथ एक किशोर बालक घूमने निकला। रास्ते में एक किसान की लड़की मिली। वह सिर पर अमरूदों का टोकरा रखे हुए उन्हें बेचने बाजार जा रही थी। इलाइजा ने भूल से उसे टक्कर मार दी, जिससे सब अमरूद वहीं गिर कर गंदे हो गए। कुछ फूट गए, कुछ में कीचड़ लग गया। गरीब लड़की रो पड़ी। ‘‘अब मैं अपने माता-पिता को क्या खिलाऊंगी जाकर, उन्हें कई दिन तक भूखा रहना पड़ेगा।’’ 


इस तरह अपनी दीनता व्यक्त करती हुई, वह अमरूद वाली लड़की खड़ी होकर रो रही थी। इलाइजा ने कहा, ‘‘भैया चलो भाग चलें, कोई आएगा तो हमें मार पड़ेगी और दंड भी देना पड़ेगा। अभी तो यहां कोई देखता भी नहीं।’’


‘‘बहन देख ऐसा मत कह, जब लोग ऐसा मान लेते हैं कि यहां कोई नहीं देख रहा, तभी तो पाप होते हैं। जहां मनुष्य स्वयं उपस्थित है, वहां एकांत कैसा? उसके अंदर बैठी हुई आत्मा ही गिर गई तो फिर ईश्वर भले ही दंड न दे, वह आप ही मर जाता है। गिरी हुई आत्माएं ही संसार में कष्ट भोगती हैं, इसे तू नहीं जानती, मैं जानता हूं।’’ 


इतना कह कर उस बालक ने अपनी जेब में रखे सभी तीन आने पैसे उस ग्रामीण कन्या को दिए और उससे कहा, ‘‘बहन तू मेरे साथ चल। हमने गलती की है तो उसकी सजा भी हमें सहर्ष स्वीकार करनी चाहिए, तुम्हारे फलों का मूल्य घर चलकर चुका दूंगा।’’ 


तीनों घर पहुंचे, बालक ने सारी बात मां को सुनाई। मां ने एक तमाचा इलाइजा को जड़ा, दूसरा उस लड़के को और गुस्से से बोली, ‘‘तुम लोग नाहक घूमने क्यों गए? घर खर्च के लिए पैसे नहीं, अब यह दंड कौन भुगते?’’


बच्चे ने कहा, ‘‘माताजी! देख मेरे जेब खर्च के पैसे तू इस लड़की को दे दे। मेरा दोपहर का विद्यालय का नाश्ता बंद रहेगा, मुझे उसमें रत्तीभर की भी आपत्ति नहीं है। अपनी गलती के लिए प्रायश्चित भी तो मुझे ही करना चाहिए।’’


मां ने उसके डेढ़ महीने के जेब खर्च के पैसे उस लड़की को दे दिए। लड़की प्रसन्न होकर घर चली गई। डेढ़ महीने तक विद्यालय में उस लड़के को कुछ भी नाश्ता नहीं मिला, इसमें उसने जरा भी अप्रसन्नता प्रकट नहीं की। अपनी मानसिक त्रुटियों पर इतनी गंभीरता से विजय पाने वाला यही बालक आगे चलकर विश्वविजेता नैपोलियन बोनापार्ट के नाम से विश्वविख्यात हुआ।    
 



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