सच्चाई व ईमानदारी से जीवन यापन करने वालों के लिए कुछ क्षण प्रभु का स्मरण करना ही पर्याप्त

Wednesday, February 7, 2018 6:03 PM
सच्चाई व ईमानदारी से जीवन यापन करने वालों के लिए कुछ क्षण प्रभु का स्मरण करना ही पर्याप्त

एक बार एक उच्च डिग्रीधारी डॉक्टर ने महात्मा गांधी से पूछा कि प्रार्थना का सबसे उत्तम तरीका क्या हो है? बापू ने बहुत खूबसूरत जवाब दिया। उन्होंने कहा कि प्रार्थना से शब्द नहीं, भाव की अहमियत का पता चलता है। सच्चे मन से की गई प्राथना चाहे केवल एक मिनट की ही क्यों न हो, वह भी काफी होती है। परमात्मा को पाप न करने का वचन देना ही काफी है। महात्मा गांधी ने कहा कि मेरी राय में न्याय करना भी एक प्रकार की प्रार्थना है। जो व्यक्ति बिना छल-कपट सबके साथ न्याय करता है, उसे दूसरी प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं है। उस इसका भी उतना ही आर्शीवाद मिलेगा, जितना किसी देव प्रार्थना से मिलेगा।


गलतियों की माफी जरूरी प्रार्थना का अर्थ है अपने इष्ट से श्रद्धा भाव, आदरपूर्वक अपनी मन की बात कहना और अपनी गलतियों के लिए माफी मांगना है। मनुष्य के जीवन में प्रार्थना के क्षण बड़े ही कीमती होते हैं। प्रार्थना मनुष्य को विनम्र और शांत बनने में सहायक होती है और यह माध्यम है जिसके द्वारा हम इस विश्व ब्रह्मांड की सर्व शक्तिमान सत्ता के साथ अपना एक संबंध जोडने का प्रयास करते हैं। इस दौरान हम इस बात का अनुभव करते हैं कि उस परम पिता की इच्छा के बिना हमारा जीवन एक पल भी नहीं चल सकता। 


दो घड़ी का स्मरण ही पर्याप्त जो मनुष्य सच्चे हृदय से पूर्ण धैर्य और श्रद्धा के साथ ईश्वर की प्रार्थना करते हैं, उन्हें अपने जीवन में ईश्वर की पवित्र उपस्थिति अनुभव अवश्य होता है। जो लोग ईश्वर के अस्तित्व को सतत् अपने भीतर अनुभव करते हैं और सच्चाई व ईमानदारी से जीवन यापन करते हैं, उनके लिए कुछ क्षण ही प्रभु का स्मरण करना ही पर्याप्त है। जो केवल पाप कर्म ही करते हैं, उनके लिए तो प्रार्थना के 24 घंटे भी कम होंगे। बापू एक गहरी बात कहते थे कि हम साधारण वर्ग के मनुष्यों के लिए एक मध्य का मार्ग है प्रार्थना।


न तो हम ऐसे उन्नत हैं कि यह कह सकें कि हमारे सब कर्म ईश्वरार्पण है और न ही इतने गिरे हुए ही हैं कि केवल स्वार्थी जीवन ही बिताते हैं। प्रार्थना में मन की वृत्ति और भावों का ही महत्त्व होता है शब्दों का नहीं। फिर भी प्रार्थना अपनी मातृ भाषा में हो तो उसका असर ज्यादा होता है। उदाहरण के तौर पर अगर ‘राम’ शब्द के उच्चारण से जो असर हिन्दुओं पर होगा, वही असर ‘गॉड’ करने पर ईसाइयों पर और ‘अल्लाह’ कहने पर मुसलमानों पर होगा। कारण यह कि आस्था उसके जन्म के साथ ही उसके परिवार, समाज, देश व धर्म के साथ ही विकसित होने लगती है।



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