पूर्वजों के गुणों का अनुसरण करें

Wednesday, March 15, 2017 3:07 PM
पूर्वजों के गुणों का अनुसरण करें

पूर्वजों के गुणों का अनुसरण करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना है। 5 वर्ष की आयु तक पुत्र को प्यार करना चाहिए। इसके बाद 10 वर्ष तक उस पर निगरानी रखी जानी चाहिए और गलती करने पर दंड भी दिया जा सकता है परंतु 16 वर्ष की आयु के बाद उससे एक मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए। 


परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को न मानकर उसकी कथित पूजा करना अथवा अपात्र को दान देना, ऐसे कर्म क्रमश: कोई कर्म-फल प्राप्त नहीं कराते, बल्कि पाप का भागी बनाते हैं।

 
परमात्मा जिसे जीवन में कोई विशेष अभ्युदय-अनुग्रह करना चाहता है, उसकी बहुत-सी सुविधाओं को समाप्त कर दिया करता है। 


पिता सिखाते हैं पैरों पर संतुलन बनाकर व उंगली थाम कर चलना, पर मां सिखाती है सभी के साथ संतुलन बनाकर दुनिया के साथ चलना, तभी वह अलग है, महान है। 

 

पाप की एक शाखा है-असावधानी।


पापों का नाश प्रायश्चित करने और इससे सदा बचने के संकल्प से होता है। 


पढऩा एक गुना, चिंतन दोगुना, आचरण चौगुना करना चाहिए। 


परोपकारी, निष्कामी और सत्यवादी यानी निर्भय होकर मन, वचन व कर्म से सत्य का आचरण करने वाला देव है। 


प्रेम करने का मतलब सम-व्यवहार जरूरी नहीं, बल्कि सम-भाव होना चाहिए जिसके लिए घोड़े की लगाम की भांति व्यवहार में कभी ढील देना पड़ती है और कभी खींचना भी जरूरी हो जाता है। 



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