खुद में न करें इस भावना का विकास, पहुंचते हैं अंत के निकट

Sunday, March 12, 2017 4:49 PM
खुद में न करें इस भावना का विकास, पहुंचते हैं अंत के निकट

एक जंगल में बांस के पेड़ के साथ-साथ आम का पेड़ भी था। बांस का पेड़ कद में लम्बा था और आम का पेड़ छोटा था। यह देखकर बांस का पेड़ अक्सर आम के पेड़ का मजाक उड़ाता और कहता, ‘अरे आम, मैं कितना बड़ा हो चला, कितनी तेजी से बढ़ा और एक तुम हो जो इतनी आयु होने पर भी छोटे ही बने हुए हो।’


आम बोला, ‘यह तो हर किसी की अपनी-अपनी प्रकृति है। कद ऊंचा हो जाने से या शरीर विशाल होने से कुछ नहीं होता। छोटा होने का यह अर्थ नहीं कि वह महान और बड़े काम नहीं कर सकता। इसी तरह लम्बे या बड़े होने का यह अर्थ नहीं कि वह छोटे काम को घृणा की नजर से देखे।’


किंतु बांस को उसकी बातें समझ में नहीं आईं। कद के घमंड में चूर वह बोला, ‘तुम मेरे बड़़े कद से जलते हो। इसलिए मुझे ऐसी बातें सुना रहे हो। भला मैं छोटे काम क्यों करूं?’ 


कुछ वक्त के बाद आम के वृक्ष पर मंजरियां लगीं और कुछ दिनों बाद वह फलों से लद गया। फलों से लदा होने की वजह से वह झुक गया और बांस दिनों-दिन लम्बा होकर सूखता चला गया किंतु उसका अभिमान अभी भी कम नहीं हुआ था। एक दिन वह आम को देखकर बोला, ‘मुझे देखो मैं दूर से ही नजर आ जाता हूं और एक तुम हो जो फलों से लदकर झुके जा रहे हो और छोटे होते जा रहे हो।’ 


अभी उनकी बातें खत्म ही हुई थीं कि कहीं से यात्रियों का एक झुंड वहां पर आया। उन्होंने आम के वृक्ष को फलों से लदा हुआ देखा और वहीं डेरा डाला और विश्राम करने लगे। रात होने पर ठंड से बचने के लिए उन्होंने आग जलाने की सोची और पास ही खड़े बांस के वृक्ष को काटकर लकड़ियों का ढेर लगा दिया। कुछ ही देर में बांस का पेड़ राख हो गया। आम का वृक्ष अभी भी शांत था और राहगीरों को अपनी छांव तले विश्राम दे रहा था जबकि अभिमानी बांस का अंत हो चला था। 


 



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