वेदों के नीति उपदेश: दम्पति करेंगे फॉलो, कोई विलेन नहीं ला पाएगा उनके बीच दरार

Friday, December 22, 2017 2:28 PM
वेदों के नीति उपदेश: दम्पति करेंगे फॉलो, कोई विलेन नहीं ला पाएगा उनके बीच दरार

वेदों में प्रतिपादित नैतिक एवं मानवीय मूल्य किसी स्थान, कला या देश धर्म की परिधि में बंधे हुए नहीं हैं अपितु शाश्वत तथा सर्वकालिक हैं। यही कारण है कि युगों से मानव मात्र का मार्गदर्शन करता हुआ यह वैदिक साहित्य आज भी तथा आने वाले युगों पर्यंत ‘सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय’ की कल्याणकारक नीति, नियमों आदर्शों तथा संस्कारों का दिग्दर्शन तथा उद्घोष करने में समर्थ है। नैतिक गुणों अथवा मानवीय मूल्यों या नीतियों पर यदि विचार करें तो नीतियां मुख्यत: दो प्रकार की होती हैं- एक व्यक्तिपरक नीतियां- मन, वचन, कर्म, विवेक, ज्ञान, सत्याचरण आदि और दूसरी समाजपरक नीतियां यथा-समत्व भावना, मैत्री, सत्संगति, दान, धर्म, परोपकार, अतिथि सत्कार आदि। इसी में सदाचरण, सद्व्यवहार आदि तत्व भी सम्मिलित किए जा सकते हैं।


वेदों में इन सभी प्रकार के नैतिक एवं मानवीय गुणों का उद्घोष तथा इसमें प्रवृत्ति का प्रोत्साहन उपलब्ध होता है, साथ ही सभी नीतिपरक नियमों, कर्तव्यों, शुद्धाचरण आदि के अनुकरण एवं अनुसरण की विशिष्टता का प्रतिपादन भी हुआ है। इन्हीं नीतिपरक उपदेशों में से एक है-दम्पति अर्थात पति-पत्नी के नैतिक कर्तव्य। दम्पति समस्त सामाजिक व्यवस्था का आधार हैं। अत: भारतीय आश्रम व्यवस्था में ब्रह्मचर्य, संन्यास और वानप्रस्थ, ये तीनों आश्रम गृहस्थ पर निर्भर हैं और गृहस्थ आश्रम के मूल में दम्पति हैं। अत: दम्पति का समाज में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है। गृहस्थ यदि सुखी एवं सम्पन्न है तो अन्य आश्रमों की प्रगति अबाध रूप से होगी। वेदों में विशिष्ट रूप से ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में विवाह संस्कार, पति और पत्नी के अधिकार तथा कर्तव्यों का विस्तृत विवेचन है।


इनमें कुछ कर्तव्य ऐसे हैं जो पति- पत्नी के लिए पृथक-पृथक रूप से वर्णित हैं तथा कुछ ऐसे हैं जिनका पालन पति-पत्नी दोनों को करना चाहिए। पत्नी के भरण-पोषण की पूर्ण व्यवस्था करना पति का सर्वप्रथम कर्तव्य है। ऋग्वेद का मंत्र कहता है कि पति सौभाग्य के लिए पत्नी का पाणिग्रहण करता है और वह यह कहता है कि मैं इसके पालन-पोषण का उत्तरदायित्व लेता हूं : गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तम्। —ऋग 10.85.36


पति का कर्तव्य है कि वह पत्नी के जीवन स्तर को उन्नत करे। उसकी शिक्षा का स्तर ऊंचा करे और आर्थिक समृद्धि से उसके भरण-पोषण की व्यवस्था उन्नत करे। जीवन में नवीनता का संचार करे। पति का यह भी कर्तव्य है कि वह सभी सुख-सुविधाएं प्रदान करके पत्नी को प्रसन्न रखे जिससे वह पति को आत्मसमर्पण के लिए उद्यत रहे : उतो त्वस्मै तन्वं वि सस्रे, जायैव पत्य उषती सुवासा:। —ऋग 10.71.4


पति अपनी पत्नी से छिपाकर कोई काम न करे। पति और पत्नी दोनों के कार्य एक-दूसरे की जानकारी में होने चाहिएं। अथर्ववेद में पति के लिए प्रयुक्त कुछ विशेषणों से उसके गुणों का बोध होता है। पति के लिए प्रयुक्त कुछ विशेषण हैं: यम: (संयमी), राजन (तेजस्वी एवं सम्पन्न), असित: (बंधनों से मुक्त), कश्यप:(दृष्टा विचारक), गय: (प्राणशक्ति सम्पन्न)। इससे ज्ञात होता है कि उत्तम गुणों वाला व्यक्ति पति हो सकता है।


घर की व्यवस्था का पूर्ण उत्तरदायित्व स्त्री पर होता है, अत: वह गृह स्वामिनी है। ऋग्वेद में पत्नी को गृहपत्नी अर्थात गृहस्वामिनी या गृहलक्ष्मी कहा गया है। इसमें स्त्री को ही घर कहा गया है-जायेदस्तम्। वस्तुत: घर या घर की व्यवस्था स्त्री पर निर्भर है, अत: उसे घर कहा गया है। संस्कृत में सुभाषित भी है : न गृहं गृहमित्याहुर्गृहणी गृहमुच्यते।


अर्थात घर-घर नहीं है, अपितु गृहिणी (स्त्री) ही घर है। अथर्ववेद में भी पत्नी का स्थान अत्यधिक उत्कृष्ट बताते हुए उसे गृहस्वामिनी, गृहलक्ष्मी, कल्याणी आदि कहा गया है। वह पति के परिवार में पहुंच कर गृहपत्नी या गृहस्वामिनी हो जाती है।


पत्नी का कर्तव्य है कि वह पूरे परिवार को सुख दे। वह पति, सास, ससुर एवं मान्य जनों की सेवा करे। वेद मंत्र स्त्री को आदेश देता है कि उसकी दृष्टि में मृदुता हो, कुटिलता नहीं, वह परिवार को सुख दे, वीर संतान को जन्म दे, देवभक्त एवं आस्तिक हो, उसमें सौमनस्य हो, वह पति की हित चिंतक हो, संयमी जीवन व्यतीत करे, तेजस्विनी हो, पशुओं आदि के प्रति उसका व्यवहार उत्तम हो।
अधोस्चक्षु: सुयमा वीरसू:, देवकामा, शिवा पशुभ्य:। —अथर्व 14.2.17-18


अथर्ववेद कहता है कि पत्नी पति के आदेशानुसार चले और उसके मन के अनुसार कार्य करे। वह पति से विरोध न करे : संप्रिया पत्याविराधयन्ती। —अथर्व. 2.36.4


अपनी त्रुटियों के लिए प्रायश्चित करने वाली पत्नी कभी दुखी नहीं होती। पत्नी के संदर्भ में अथर्ववेद में एक रोचक प्रसंग है कि गंधर्व अप्सराओं में तीन विशेषताएं हैं: सौंदर्य, अलंकृत रहना और आमोद-प्रमोद का जीवन व्यतीत करना परन्तु गृहपत्नी में चार विशेषताएं होती हैं। इसके अतिरिक्त चौथी विशेषता है संयम या चरित्रबल। इसके कारण वह अप्सराओं से भी श्रेष्ठ है : तिस्रो मात्रा गन्धर्वाणां, चतस्रो गृहपत्नया:। —अथर्व 3.24.6


वेदों में स्त्री के पतिव्रता गुण का महत्व बताया गया है कि पतिव्रता स्त्री के पुण्य से उसका पति दीर्घायु होता है और उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती। पति और पत्नी के सामूहिक कर्तव्यों के विषय में वेद कहता है कि गृहस्थ को सुखमय बनाने के लिए दम्पति को कुछ नैतिक कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। वेद कहता है कि जीवन को सुखमय बनाने के लिए सर्वप्रथम आवश्यकता है कि दम्पति में आस्तिकता हो। वेद का आदेश है कि परमात्मा को सर्वव्यापक मानते हुए कार्य करो। ऐसा करने से मन प्रसन्न होगा और सभी दुर्गुण दूर होंगे।


जीवन को कर्मठ बनाना, सत्य भाषण, पारस्परिक सौहार्द (समापो हृदयनि नौ), मृदु भाषण, संयमी होना तथा खुले हाथों से दान करना आदि कुछ नैतिक कर्तव्य दम्पति के लिए बताए गए हैं।


अथर्ववेद कहता है कि दोनों के हृदय परस्पर मिले हुए हों, वे दोनों एक-दूसरे का ही चिंतन करें : अन्त: कृणुष्व मां हृदि। —अथर्व. 7.36.1


दोनों का प्रेम इतना प्रबल हो कि वे दोनों एक-दूसरे के हृदय को उसी प्रकार हिला दें जैसे वायु तिनके को। वे राष्ट्रीय उन्नति के लिए साथ बढ़ें और अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त करें। इस प्रकार वेदों में दम्पति के कर्तव्यों का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है जो अत्यधिक प्रासंगिक तथा महत्वपूर्ण है। यदि वर्तमान समय में भी दम्पति इन मूल्यों का अंश मात्र भी अनुसरण करें तो पारिवारिक विघटन तथा समाज में नैतिक मूल्यों के ह्रास को रोका जा सकता है। 



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