श्री सिद्ध बाबा सोढल जी का मेला आज: बैंड-बाजों के साथ आने लगे भक्त

Tuesday, September 5, 2017 11:33 AM
श्री सिद्ध बाबा सोढल जी का मेला आज: बैंड-बाजों के साथ आने लगे भक्त

श्री सिद्ध बाबा सोढल जी का मेला अनंत चौदस पूर्णिमा को त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बाबा जी का जन्मोत्सव होता है। आज ये पर्व जालंधर शहर में बहुत धूम-धाम के साथ मनाया जा रहा है। श्रद्धालुअों की भीड़ बाबा जी के दर्शनों के लिए 3-4 दिन पहले से ही उमड़नी शुरू हो जाती है। चड्ढा और आनंद बिरादरी के अलावा अन्य लोग भी अनंत चौदस वाले दिन बाबा जी पर टोपा (प्रसाद) चढ़ाते हैं और खेत्री बाबा जी को अर्पित करते हैं। इस दरबार से लगभग सभी धर्म-समुदायों की आस्था जुड़ी है।
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श्री सिद्ध बाबा सोढल जी का मंदिर और तालाब लगभग 200 वर्ष पुराना है। इससे पहले यहां चारों ओर घना जंगल होता था। दीवार में उनका श्री रूप स्थापित है। जिससे मंदिर का स्वरूप दिया गया है। अनेक श्रद्धालुजन अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मंदिर में आते हैं। बाबा सोढल में हर धर्म व समुदाय के लोग नतमस्तक होते हैं। अपनी मन्नत की पूर्ति होने पर लोग बैंड-बाजों के साथ बाबा जी के दरबार में आते हैं। श्रद्धालु लाइनों में लगकर बाबा जी के दर्शन करते हैं। मंदिर के बाहर आस-पास सड़कों के किनारे अनेकों दुकाने सजी हुई होती हैं। बच्चों हेतु झूले अौर लोगों की सेवा हेतु जगह-जगह पर विभिन्न प्रकार के लंगर भी लगे होते हैं।
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श्री सिद्ध बाबा सोढल जी की कथा
प्राचीन समय में श्री सिद्ध बाबा सोढल जी का जहां मंदिर स्थापित है उस स्थान पर एक संत जी की कुटिया और तालाब था। यह तालाब अब सूख चूका है, परंतु उस समय पानी से भरा रहता था। संत जी भोले भंडारी के परम भक्त थे। जनमानस उनके पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए आया करते थे।
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चड्ढा परिवार की बहू जो उनकी भक्त थी, बुझी सी रहती। एक दिन संत जी ने पूछा कि बेटी तू इतनी उदास क्यों रहती है? मुझे बता मैं भोले भंडारी से प्रार्थना करूंगा वो तुम्हारी समस्या का समाधान अवश्य करेंगे। संत जी की बात सुनकर उन्होंने कहा कि मेरी कोई संतान नहीं है और संतानहीन स्त्री का जीवन नर्क भोगने के समान होता है। संत जी ने कुछ सोचा फिर बोले, बेटी तेरे भाग्य में तो संतान सुख है ही नहीं, मगर तुम भोले भंडारी पर विश्वास रख वो तुम्हारी गोद अवश्य भरेंगे।
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संत जी ने भोले भंडारी से प्रार्थना की कि चड्ढा परिवार की बहू को ऐसा पुत्र रत्न दो, जो संसार में आकर भक्ति व धर्म पर चलने का संदेश दे। भोले भंडारी ने नाग देवता को चड्ढा परिवार की बहू की कोख से जन्म लेने का आदेश दिया। नौ महीने के उपरांत चड्ढा बिरादरी में बाबा सोढल जी का जन्म हुआ। जब यह बालक चार साल का था तब एक दिन वह अपनी माता के साथ कपड़े धोने के लिए तालाब पर आया। वहां वह भूख से विचलित हो रहा था तथा मां से घर चल कर खाना बनाने को कहने लगा। मगर मां काम छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं थी। तब बालक ने कुछ देर इंतजार करके तालाब में छलांग लगा दी तथा आंखों से ओझल हो गया।

मां फफक-फफक कर रोने लगी, मां का रोना सुनकर बाबा सोढल नाग रूप में तालाब से बाहर आए तथा धर्म एवं भक्ति का संदेश दिया और कहा कि जो भी मुझे पूजेगा उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। ऐसा कहकर नाग देवता के रूप में बाबा सोढल फिर तालाब में समा गए। बाबा के प्रति लोगों में अटूट श्रद्धा और विश्वास बन गया कालांतर में एक कच्ची दीवार में उनकी मूर्ति स्थापित की गई जिसको बाद में मंदिर का स्वरूप दे दिया गया।
 




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